शनिवार, जून 04, 2016

HAPPY WORLD ENVIRONMENTAL DAY...
देखा जाये तो प्रदूषण का मूल कारण हम स्वयं ही हैं...महान शिक्षाविद डा.सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था...,'' हमें पक्षी मानिंद हवा में उड़ना औरमछली की तरह जल में तैरना सिखया जाता है परन्तु मानव बनकर इस धरती पर कैसे रहा जाये...नही सिखाया जाता..'' हम धरती पर कैसे रह रहे हैं कि स्वयं का भी सांस लेना दूभेर हो गया है..वायु प्रदूषण ने ढेर सारी बीमारियों को आमंत्रण दे डाला..सारे पेड़ पौधे कट रहे हैं..कंक्रीट के जंगल निर्मित हो रहे हैं..ओजोन के स्तर कि मोटाई में कमी आयी है...उसकी छिद्रयुक्त परत से निकलने वाली पराबैंगनी किरणों के हानिकारक प्रभावों से हम परिचित हैं ही..तापीय विकिरण...और मौसम में , जलवायु में तीव्र बदलाव...न जाने किस दिशा को संकेत दे रहे हैं..
तरह तरह के कानफोडू हॉर्न जो हमारे कानो के साथ साथ मस्तिष्क को भी तनाव देते प्रतीत होते हैं...जल को गन्दा करना..उसकी शीतलता को गंदगी का पर्याय बनाना..क्या हमारा कोई दोष नही है ? सोचें और विचार करें..पोलीथिन का प्रयोग न करना हमारा नैतिक दायित्व है..पर हमारा जीवन तो जैसे उसके बिना संभव ही नही है..भले ही हमारे भोले मासूम चौपाये मर ही क्यों न जाएँ..जिस केमिकल से पौलिथिन निर्मित होती है..भले ही वह हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक क्यों न हो...
अम्ल वर्षा से हमारा '' ताजमहल''....स्टोन कैंसर से पीड़ित हो गया है...उसकी नैसर्गिक सुन्दरता खतरे में है..और हम असंवेदनशील होकर '' पर्यावरण दिवस '' कि खानापूर्ति कर रहे...प्राचीन समय में हमारा पर्यावरण स्वच्छ था..बच्चों को प्रकृति के समीप ले जाइये...हमारी कुदरती धरोहरों से उनका परिचय बढाइये..हमारे 33 करोड़ देवी देवता...यही पेड़ पौधे..पंछी और पशु ही हैं..जिन्हें लोक कथाओं के माध्यम से हमारे जेहन में डाला जाता था..वृक्षों कि कमी भी एक बड़ा कारण है..कम से कम एक प्रयास'' एक पौधा रोपकर ''तो हम कर ही सकते हैं..दूसरा छोटा सा प्रयास पौलिथिन को'' बाय बाय '' करके कर सकते हैं..
- ज्योत्सना सक्सेना

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