रविवार, जून 21, 2015

पिता का प्यार

पिता का प्यार 
पिता के रूप में जब हम किसी पुरुष की कल्पना करते हैं तो एक साहसी , ऊर्जावान, रौबीला, शक्तिशाली सा व्यक्तित्व नजर आता है..जो कि घर का मुखिया होता है..
इसका कर्तव्य है घर कि भौतिक सुख- सुविधाओं में वृद्धि करना और बच्चों को अपने व्यक्तित्व से अनुशासन का मार्ग दिखाना I जबकि माँ से आज के युग को ढेरों अपेक्षाएं हैं..
माँ जीवन पर्यंत अपनी स्नेहिल छाँव में बच्चे का विकास करती है..घरेलू कामकाज के साथ साथ बाहर के कार्य भी अधिकांशतः स्त्रियाँ आज पुरुषों कि तरह ही कर रहीं हैं..तभी शायद बच्चे पूरी जिंदगी माँ के चुम्बकीय ममत्व से आकर्षित रहते हैं..
भावनात्मक रूप से स्त्री व पुरुष में कुछ बुनियादी अंतर होता है..प्रकृति ने स्त्री को ममता का स्वरुप तथा पुरुष को शक्तिशाली स्वरुप प्रदान किया है..जब बच्चा माँ के गर्भ में रहता है...तभी से उसे माँ के रूप में सुरक्षित आश्रय मिल जाता है..जो कि निरंतर निर्बाध गति से उसे पूरी जिंदगी स्नेह, वात्सल्य और ममता के रूप में प्राप्त होता है..
पिता का प्यार पृष्ठ का पिछला हिस्सा है..जहाँ माँ स्नेह रस की वर्षा से बालकरुपी पौधे का सिंचन करती है..वहीँ पिता के कार्य उसे बाह्य जगत से परिचित कराते हैं ..पिता का प्यार बालक कि बुद्धिजीविता को जाग्रत करता है..बालक को अपनी सीमाओं में नियंत्रित रहकर अनुशासन की परिधि में रहना सिखाता है..
माँ केवल बच्चे के पालन पोषण के लिए जिम्मेदार है..यह धारणा सर्वथा गलत है..पिता के सही दिशा निर्देश..माँ का स्नेह मिलकर ही बालक के व्यक्तित्व को पूर्णता प्रदान कर सकते हैं,,
- ज्योत्सना सक्सेना

शुक्रवार, जून 05, 2015

नए बरस पर लिखे थे दोहे

कैसा निकला ये बरस , बोलूं क्या श्रीमान
धरती की चीखें सुनी , देखा लहूलुहान
एक ओर तो दुःख बड़ा , पीड़ा है घनघोर
घायल है इंसानियत , बच्चों का हैं शोर
देश हमारे रह रहा , मिलजुलकर इंसान
कर्मठता को कर नमन , उड़ाए मंगलयान
इतनी बिनती ज्योति की , सुन लो हे जगदीश
विनीत भाव मांग रही , खड़ी झुकाये शीश
पग धरती छूते रहें , मन गगन का छोर
साहस भरे उठें कदम , नई भोर की ओर
ममता करुणा मन बहे , ऐसा दो वरदान
फूटें रश्मि की किरणें, मिटे तमस की खान
भाईचारा बढ़ सके ,सबको दो सद्ज्ञान
विश्वगुरु बने हमारा , भारत देश महान
-- ज्योत्सना सक्सेना

नवसृजन

साँसे प्रतिकूल होती हैं नवजीवन सृजन के लिए 
माटी में मिलता है जिस्म खुशबूदार चमन के लिए 
घनघोर तिमिर हो जब हर जगह समझो आगाज़ है 
उम्मीद भरे चमकते सूर्य का , विनीत नमन के लिए 
-- ज्योत्सना सक्सेना

तन्हाई का दर्द

उम्मीदों का 
सागर 
ठठा कर 
पार कर गया 
अपनी सरहदें 
खामोश शब में
चाँद को पुकारता
पहुँच गया
खुशबुओं की बस्ती में
खारी नमकीन आसूं भरी
ग़ज़ल सुनाने
ज़ख्मों को सहलाने आया
या तन्हाई के दर्द को और बढ़ाने???
-- ज्योत्सना सक्सेना

संक्रांति पर लिखी थी ये कविता

हिमश्रृंगी काँधे पर मुस्कुराकर चढ़ने लगी धूप
अकड़े फैले कुहासे को बाँहों में समेटने लगी धूप
इंद्रधनुषी गठजोड़ से धरा ले रही फेरे गगन संग 
प्रेम ऊष्मा भरी भावनाओं में पिघलने लगी धूप
अंगड़ाई लेते वृक्ष इठलाती पत्तियां चहकते पंछी 
निखरती सजती प्रकृति पर दृष्टि रखने लगी धूप
लाल पीले वसन पहनाती रंगीन तितली सी फिरकती
फूलों के गहनो से आशा मधुमास बुलाने लगी धूप
कृष्ण को पुकारती निशा अश्रु पोंछती कलुषता हरती
राधा सी मोहनी फेरती बंसी धुन पे थिरकने लगी धूप
सूर्या चला उत्तरायण हिरणी सी उछल खूब इतराई
पतंगों संग मकर संक्रांति के तिल सी चटकने लगी धूप
-- ज्योत्सना सक्सेना

याद आने लगे

चाँद देखा आज पूरा , 
याद तुम आने लगे 
फूल महके हैं गगन में , 
स्वप्न से छाने लगे 
मधु घुला मधुमास साजन , 
लाज से सिमटी निशा
बोलते तारे ठुमकते ,
छा रहा कैसा नशा
-- ज्योत्सना सक्सेना

चांदनी के फूल

हरेक मोड़ पर राह पे तेरी अश्कों के मोती बिछाए मैंने
शब भर बेदर्द तेरे लिए चांदनी के फूल बिछाए मैंने
टूट गया भरम कांच सा आज ही जो कल टूटना ही था
जाने क्यूँ सारी सारी रात गेसुओं में गजरे महकाए मैंने
मौजे - रवानी के भंवर में फंस गई कागज़ की कश्ती
सर्द यादों में दर्द भरे नगमें जाने क्यों गुनगुनाये मैंने
हथेली की लकीरों में लिखा ही नही था खुदा ने तेरा नाम
सुर्ख मेहंदी से तेरे नाम क्यूँ अपनी हथेली में रचाए मैंने
नई ताज़गी से फिर से महकेगी मोहब्बत तेरी 'ज्योत्स्ना '
इसी खुशफहमी में कुछ सूखे फूल डायरी में छिपाए मैंने
-- ज्योत्सना सक्सेना

कुछ चौपाई एक दोहे के साथ

कुछ चौपाई एक दोहे के साथ ,,,,
नभ लाये भर भर पिचकारी
धरा हुई नभ पर मतवारी
खुशियों भरी बदलियाँ बोली
फूल फूल से भर लो झोली
ओढ़े चूनर धानी धानी
धरा बन गई सुन्दर रानी
कुदरत की रंगत चटकीली
नभ पहने शेरवानी नीली
अवनि करे मिलन की आशा
अम्बर गढ़े प्रेम परिभाषा
सावन सी आँखे भरी ,मधु बरसायें होठ
चाँद सा चेहरा लगे , घूंघट बदली ओट
-- ज्योत्सना सक्सेना

भारत

संस्कार सभ्यता संस्कृति का आव्हान है ,,,,, भारत 
वीर शहीदों की गाथा का गौरव गान है ,,,,,,,,भारत 
नीचे हरी भरी धरा तो ऊपर मंगल यान की उड़ान है 
वेदउपनिषद दर्शन योग का संज्ञान है ,,,,,,, भारत 
-- ज्योत्सना सक्सेना

पुतलियाँ

प्रभु की पुतलियों का ना ठौर ना ठिकाना है 
सूनी शाम आँखों का धुंधलापन ही जाना है 
ना मरण है ना ही जन्म अंगड़ाई है जीवन 
चोला बदलकर इस जगत फिर से आना है 
-- ज्योत्सना सक्सेना

मतवाली बूंदे

बादल को पायल पहना दी 
छम छम बूंदे हैं मतवाली 
धरती ओढ़े चूनर पीली 
फूलों से भर लेती झोली 
बादल को पायल पहना दी 
छम छम बूंदे हैं मतवाली
साजन मेरे आ जाते तो
बाते आज नशीली होतीं
बूंदों संग तुम उतर आते
आँगन में रंगोली होती
बादल को पायल पहना दी
छम छम बूंदे हैं मतवाली
तुम मुझसे रूठे ना होते
सखियों संग ठिठोली होती
चंदा हिय मेरे बस जाता
चांदनी रात अनोखी होती
बादल को पायल पहना दी
छम छम बूंदे हैं मतवाली
होली पर तुम आ ही जाना
चूनर सतरंगी कर जाना
बादल को पायल पहना दी
छम छम बूँदें हैं मतवाली
-- ज्योत्सना सक्सेना

एक दोहा

कर्मों को तू जोड़ ले , जाएँ वही शमशान 
हाथ पसार चला गया , था सिकंदर महान 
-- ज्योत्सना सक्सेना

चंदा रे चंदा

बहुत दूर फलक पे है , अपनापन समाया है
चंदा तू कुछ भी नही , पर दिल में समाया है
अकेला ये जीवन है , नयनो भरा सावन है
दूर तेरे मुखड़े में , बिम्ब उनका समाया है 
चंदा तू कुछ भी नही , पर दिल में समाया है
चाहत के सितारे हैं , विरह भरे तराने हैं
मन आँगन उतर आओ , भीगा शामियाना हैं
चंदा तू कुछ भी नही , पर दिल में समाया है
गम के घने बादल हैं , आशा भरी बिजली है
अँधेरे में जीने की ,कला को चमकाया है
चंदा तू कुछ भी नही , पर दिल में समाया है
शाम नखराली है रे , दीदारे दिल प्यासा है
बेनूर होकर भी तू , सात रंग से नहाया है
चंदा तू कुछ भी नही , पर दिल में समाया है
बहुत दूर फलक पे है , अपनापन समाया है
चंदा तू कुछ भी नही , पर दिल में समाया है
-- ज्योत्सना सक्सेना

प्रेम दिवस पर सृजित रचना

परियों की चितवन में 
तितली की थिरकन में 
मेहँदी की सुर्खी में 
सूरज के ढलने में 
चाँद के चमकने में
प्रेम का विस्तार हो ----
काजल की गहराई में
भावों की तरुणाई में
स्पंदित लबों में
वादों की शहनाई में
सम्भावना का विस्तार हो ----
केश के गजरे में
कंगन के बजने में
पायल की रुनझुन में
बिंदिया की दमकन में
रोम रोम की पुलकन में
नेह का विस्तार हो --
आस की मुंडेर पे
कागा की टेर पे
शाश्वत अनुभूति में
रूहानी अभिव्यक्ति में
प्रेममय विश्व विस्तार हो --
-- ज्योत्सना सक्सेना

ध्यान

समय शेष कम पग धरो , ध्यान डगर की ओर
बंधन उससे बाँध ले , प्रेमोदय की भोर
अनूठा आनंद मिला , ली इक गहरी श्वास
खोकर खुद को पा लिया , थी जन्मों की प्यास
जीभ बड़ी चंचल चपल , हुलस हुलस इतरात
बस में कर लीजो इसे , पलट कभी ना आत
-- ज्योत्सना सक्सेना

मुक्तक-लोक का शब्द-मुक्तक सम्मान

मुक्तक-लोक का शब्द-मुक्तक सम्मान 
``````````````````````````````````````````````
मुक्तक मेला-37 का ''शब्द-मुक्तक सम्मान '' आदरणीया Jyotsna Saxena ( ज्योत्सना सक्सेना ) जी को प्रदान करते हुए 'मुक्तक-लोक' गौरवान्वित है ,हार्दिक बधाई और अभिनन्दन !
प्रदत शब्द -मीत/मित्र/ दोस्त /यार पर मुक्तक ~
``````````````````````````````````````````````````...
रिश्तों की धुंध पर प्यार का सूरज छाएगा,
भ्रम के कुहासे को पल में निगल जायेगा ,
ह्रदय साज पर बज उठेंगे फिर जलतरंग
मीत सुहानी सी इक ग़ज़ल गुनगुनाएगा !
____________________ज्योत्सना सक्सेना

कुछ दोहे ''फाग ''पर ,,, लिखे थे

कुछ दोहे ''फाग ''पर ,,,
*************************
गालों में टेसू खिले , हृदय बज रहे साज
चूनर सीली हो गई , बेसुध नाचूं आज
आलिंगन करती लगे , ये फागुनी बयार
गुनगुन करता अलि करे, छेड़छाड़ सिंगार
भंग चढ़े बिन ही पिए , ऐसा पी का संग
अंग-अंग सावन करे , लगा-लगाकर रंग
पवन हुई मदहोश सी , मँजरी गावे गीत
नीम आम बौराय से , खिली हुई थी प्रीत
छलक छलक मदिरा गिरे , नैनों से चितचोर
सरक सरक चूनर गिरे , मिले न कोई छोर 
-- ज्योत्सना सक्सेना

होली पर रची गई ये कविता



सांझ के सुरमई धुंधलके में
समंदर में घुलते नारंगी रंग की
छप्पा की छई सी
तरंगो की अठखेलियों सी
यादें तुम्हारीं,,,,,,,,,,,
फूलों के जेवरों से सजी धरा
ठिठोली करतीं तितलियां
फर फर फर चलती
फागुनी बयार सी
यादें तुम्हारी,,,,,,,,,,
शबनमी मतवाला मौसम
अहसासों की करवटें
छनका रही नुपूर
झरझर ंझरती सी
यादें तम्हारी,,,,,,,,,
खुशगवार गुलाबी धूप
हुई रोशन दिल की बस्ती
अमराई की बौर सी
कुहू कुहू करती
कोयलिया की टेर सी
यादें तुम्हारी,,,,,,,,,,
कढाई में बनते पकवान
मीठी मीठी मठरी
छन्न छन्न सिकती
गुझिया की मिठास सी
यादें तुम्हारी,,,,,,,,
शुभ होली
ंज्योत्सना सक्सेना

काली माँ का रूप धर

दुःशासन की भीर में , मत कृष्णा को टेर
काली माँ का रूप धर , कर दुष्टों को ढेर 
-- ज्योत्सना सक्सेना

प्रेम मनुहार

धरा ने थामा आस भरे माथे पे उजियारा 
सुर्ख ओढ़ने से कुदरत ने आस्मां को निखारा
प्रेम मनुहार ने कैदी बनाया रविराज को भी 
झुका गगन खंडखंड पिघला दम्भ काअंधियारा 
-- ज्योत्सना सक्सेना

एक श्रृंगारिक दोहा

एक श्रृंगारिक दोहा 
राधा सुनती बांसुरी , अलि करता मधुपान 
सन्नाटों को तोड़ अब , छोडो झूठा मान 
-- ज्योत्सना सक्सेना

कृषक की संवेदना

तड़कती बिजली 
गरजते बादल 
नयनो में ढलते 
टूटते स्वप्न आस का
टूटा था कांच
बूंदों की किरचें चुभ रहीं
सुलगते खेत देख
रो रहा किसान ---
बहती मिटटी उगल रही
हताशा का संसार
ताश सा थरथराने लगा
उम्मीद भरा महल आलीशान
सुलगते खेत देख
रो रहा किसान ---
दाने दाने सुबक रहे
पूछे अपना मोल
सरसों भटकी राह अपनी
जीरा रोया जार जार
कर्ज ने कतरे पंख
हौसलों के
सुलगते खेत देख
रो रहा किसान ---
कठिन श्रम
ना छुट्टी ना त्यौहार
एक बार फिर जुटना होगा
पुनः कर्मरथ चढ़ना होगा
सूर्य तुम्हे झुकना होगा
तपकर मेरी उम्मीदों पर
एक बार खरा उतरना होगा
आशाओं के दीप जलाता
उठ फिर खड़ा हुआ किसान
-- ज्योत्सना सक्सेना

स्त्री हूँ मैं ,,,

अश्रु सागर में बेचैन लहरे छिपाना जानती हूँ मैं 
संघर्ष शूल सृजन पुष्पों में बदलना जानती हूँ मैं 
तन्हाइयों में भी गीतों का आगाज़ कर सकती हूँ 
शब स्याही निगल नया सूरज गढ़ना जानती हूँ मैं 
-- ज्योत्सना सक्सेना

रिश्तों के शमशान



भाव समर्पण हो जहाँ , सुन्दर बने जहान
प्रेम सेतु झूले पड़े , कहते उसे मकान
दिल से मिलते दिल यहाँ ,मिटे शोक अवसाद
मिले उदासी को यहाँ , मीठा मीठा स्वाद
सद्कर्मों की राह ले , सीखें सद्व्यवहार
संतोष सिखाते बड़े , लक्ष्मी आये द्वार
देह को पहचान मिली , निश्छल बरसे प्यार
जीवन लक्ष्य सफल हुए , स्वप्न होंगे साकार
दिल में दूरी बढ़ गई , ज्यों बड़े हुए मकान
मौन मौन के खेल में , रिश्तों के शमशान
-- ज्योत्सना सक्सेना

उमंगों के कचनार

करुणा सम बोध अपार हो 
आत्मिक प्रेम विस्तार हो 
कुदरत मिजाज़ अनुकूल रहे 
खिले उमंगों के कचनार हो 
-- ज्योत्सना सक्सेना

'गीतिका-गुंजन-40' के लिए ''मुक्तक-लोक गीतिका गुंजन सम्मान ''

गीतिका~
``````````````
*
ना दोस्त निकले ना रक़ीब निकले
ये दर्द के रिश्ते बड़े अजीब निकले
समझ आई न हथेली की तहरीरें
मेरे कुछ ऐसे ही नसीब निकले
वफ़ा की राह ना चल सके तुम भी
जो अनजान थे तेरे करीब निकले
किसे दिखाऊं दर्द भरे सन्नाटे
खामोश गम ही मेरे हबीब निकले
दौलत ए वफ़ा से मैं हूँ मालामाल
तुम तो शख्स बड़े ही गरीब निकले
________________ज्योत्सना सक्सेना

उस पार

देख हिमालय गल रहा 
अंतिम प्रहर छल रहा 
पार उधर अब चल चलें 
नव रश्मि दीप जल रहा 
-- ज्योत्सना सक्सेना...

नश्वर देह

रूप श्रृंगार संसार थोथा है भाई 
ध्वनि है अनहद नाद की दे रही सुनाई 
कर्मों की गठरी जरा हलकी ही रखना 
ध्रुव तारे ने दूर ही दिशा है दिखाई 
-- ज्योत्सना सक्सेना..

चाह ना और सजना

कुछ देर ठहर जाओ , चाह ना और सजना 
नयनन में बस जाओ , अमृत मांगूं सजना
तनहा न रहूँ इक पल , कुछ स्वप्न सजा जाओ 
ढल जाये ग़ज़लों में , इक साज़ बजा जाओ 
नयनन में बस जाओ , अमृत मांगूं सजना
सितारों की नगरी में , तनहा ना रह जाऊं
ख्वाबों के बादल में , इक चाँद उगा जाओ
नयनन में बस जाओ , अमृत मांगूं सजना
सूने होते उपवन में , सुगंध बहा जाओ
जर्द हुए नशेमन को , प्रेमसुधा पिला जाओ
कुछ देर ठहर जाओ , चाह ना और सजना
नयनन में बस जाओ , अमृत मांगूं सजना
-- ज्योत्सना सक्सेना

मुक्ति राह

मुक्ति राह 
***********
वक़्त की सलवटों के 
दस्तावेज़ में 
वसंत के कुछ पल 
मेरे नाम कर दो
उतार दो
गहरे उतार दो
शून्य में सिमट सकूँ
सिक्कों की खनक से
दूर , बहुत दूर
कुछ सूफियाना गीत
जिन्हे पढ़ सकूँ
सुन सकूँ
रूह की गहराई में
त्याग दूँ
दिया तेरा वेश मैं
दिशा मुझे मिल सके
चल सकूँ बन मुसाफिर
मुक्ति की राह में ,,,,
-- ज्योत्सना सक्सेना

गीतिका

गीतिका :
माटी में हम पाँव जमाएँ
नभ से फिर हम आस लगाएँ
पवन समीरण दीप जलाएँ
लहर लहर मधु घट छलकाएँ
मुखमंडल ओजस्वी दमके
वाणी प्रेम सुधा बरसाएँ
चेतनता के स्वर फिर गूंजे
चलो सृजन की पौध लगाएँ
धुंध समय की गहरी है तो
गीतों का इतिहास बनाएँ
-- ज्योत्सना सक्सेना

स्त्री हूँ मैं ************


द्वैत अद्वैत क्या है 
ना जानती थी 
रिश्तों की पूरक हूँ 
सप्तपदी के वचनो को
समझ सकी थी इतना ही
आधे भरे हो तुम
आधे को भरना है मुझे
नही जानती थी
रिसते अधूरेपन को भरने की
परीक्षा दे रही हूँ ...
आशाओं का अंकुरण करती
छलती रही अपना ही मन
रिश्तों के मिथ्या वनों में
पल्लवित होती रही हरियाली
खिलाती रही निष्ठा के वासंती पुष्प
भ्रमरों से बचाती रही अपना अस्तित्व
रिश्तों को सुलझाती कलकल निनाद करती
अहम सागर में निष्ठा के रंग उड़ेलती रही मैं
खारेपन में समर्पण मिठास भरने का अथक प्रयास करती
बिना अर्धविराम की चाह में पूर्णत्व की ओर बढ़ती रही मैं ....
-- ज्योत्सना सक्सेना

तितलियों की बस्ती

जीवन भंवर में संभालनी पड़ती है मन की कश्ती 
खुरदुरी ज़मीन में नही मिटती ख्वाबों की हस्ती 
ए नादाँ दिल तेरे दम पे ही तो बसाई है मैंने 
मन चमन में फूलों और तितलियों की बस्ती 
-- '' ज्योत्सना सक्सेना '

ओमकार का नाद

ज़िंदगी की शाम 
एक अनाकार का 
उष्ण पैगाम 
दिल दरीचे में 
हरहराता समंदर 
किवाड़ों की सांकल खोली
प्रार्थना स्वरों ने
चप्पे चप्पे धुल गई
मन क्यारी की धूल
धड़कन धड़कन सज गया
आस्था का तरंगित साज
सकारात्मकता से
दैदीप्यमान ओजस्वी हुआ पोर पोर
कृत्रिमता से तोड़ा रिश्ता
रूहानी प्रेम की व्यापकता में
विचरती नर्तन करती
अलौकिकता के मुक्त ओमकार के
नाद में बेसुध उल्लसित डूबती गई मैं
-- ज्योत्सना सक्सेना

महात्मा बुद्ध

हो आप आध्यात्म आकाश विस्तार 
देवत्त्व के शक्ति पुंजीय अवतार 
प्रणम्य संपुष्प सम मुक्ति संमार्ग 
आनंद निर्झरण के सिद्ध भरतार 
-- ज्योत्सना सक्सेना

अमलतासी श्रृंगार

धरती की अलकों ने किया अमलतासी श्रृंगार 
खिल खिल कर रहे गुलमोहर ऊर्जा का संचार 
आमों की मधुरम सुगंध कोयलिया करे पुकार
जलविहीन सरिता रसीले फलों की आई बहार
-- ज्योत्सना सक्सेना

ख्वाब

साजन ख्वाबों में आ जाते 
मिलकर सृजन बेल लगाते 
आशा का हम दिया जलाकर 
स्मृति पुल का फेरा कर आते
कच्ची पक्की मुंडेरों पर 
प्रेम लता परवान चढ़ाते
घूंघट में आँखों की मदिरा
पांव में घुँघरू छनकाते
मधुमय डगर पनघट में हम
घटघट फिर खुशियां छलकाते
-- ज्योत्सना सक्सेना

माया है ये जगत

बावरा है ये मन 
चल पड़ा है किधर 
रोक ले ,,,, रोक ले ,,,,, रोक ले
बिखरा जादू इधर 
माया है ये जगत 
फिसलन हर डगर
मत बढ़ा तू कदम
रोक ले ,,, रोक ले ,,,, रोक ले
बन परम का फ़कीर
छोड़ अर्थ की लड़ाई
मेट धर्म की लकीर
मत बढ़ा तू कदम
रोक ले ,,, रोक ले ,,,, रोक ले
सुबह के रंगों में ढल
शाम को तारों की सुन
आज़ाद हो बंद कक्षों से तुम
मत बढ़ा तू कदम
रोक ले ,,, रोक ले ,,,, रोक ले
नदिया की कलकल तू सुन
ओस में नंगे पाँव फिर चल
मुरली वाले पे अपनी फ़िकर छोड़ दे
मत बढ़ा तू कदम
रोक ले ,,,, रोक ले ,,,, रोक ले
बिखरा जादू इधर
माया है ये जगत
मत बढ़ा तू कदम
रोक ले ,,, रोक ले ,,,, रोक ले
-- ज्योत्सना सक्सेना

जिंदगी का सफर



तन्हा वीरान उदास रेतीली डगर
क्या कहे जीवन चक्र पतझरी ये सफर
हो अँधेरा गहन फूटे तभी रविकिरण
रचो कुछ गीत जागेंगे जो हर प्रहर
कन्धों पर अहम बोझा है भारी बहुत 
छोड़ लोभ गठरी यहीं कुछ पल तू ठहर
चलाचल चलाचल करें नवसृष्टि सृजन
गायें ख़ुशी भरे मल्हार अब हम नगर
उस परम तत्व दृढ द्वार में ही छिपे
ढूंढ ले तू शतदल हो ना जाये कहर
-- ज्योत्सना सक्सेना

कुदरत की गोद

आज लैपटॉप में तकनीकी खराबी के कारण विवश होकर प्रकृति की गोद में जा बैठी..क्षितिज को अरुणिम करता सुर्ख सूरज..शीतल बयार में मस्त झूमते पेड़..जिसकी टहनी में इतराती इठलाती गौरैया..दूर कहीं कोयल की कुहू..कुहू..मानो सन्देश दे रही हो..-''क्या स्वर्गिक दैवीय सुख नहीं खो रहे हम..''
असतो मा सदगमये ..तमसो माँ ज्योतिर्गम्ये..
हे ईश!! हमें अँधेरे से उजाले की ओर ले चलो..आज हमारे पारिवारिक रिश्ते नितांत एकाकी,खोखले और स्पन्दनहीन हो चुके हैं..परिवार से ज्यादा सहभागी हम अपने मित्रों कोबनाते हैं..आज प्रत्येक व्यक्ति आप पर अपने भाव उडेलना चाहता है..अवशोषित या ग्राह्य करने का भाव तिरोहित हो चुका है शायद..हमें सुनना भी आना चाहिए मित्रों..तभी हम शक्तिशाली , स्वस्थ और आनंददायी संबंधों की भीनी खुशबू को अनुप्राणित कर सकेंगे ..हर भारतीय को पारंपरिक विरासत के रूप में आध्यात्म का कुछ न कुछ अंश मिला है..जो हमारे अवचेतन मन की परतों में घुला है..उसके भीगेपन के एहसास को पाने के लिए हमें प्यार करना होगा खुद से..कुदरत से..कुदरत की प्रत्येक वस्तु से..देखना आप एक अलौकिक आनंद से रच बस जाओगे..खुद तो मह्कोगे ही..अपने इर्द गिर्द खुशियों की सुरभि बिखेरोगे.. सच ही कहा है किसी ने..
खुदा की शान तुझमे..छिपे भगवान तुझमे..
- ज्योत्सना सक्सेना

मृगमरीचिका

मरुथल में परछाई पुकारती है 
हिरणी भावभरी जल गुहारती है
थर्राया देख रेत का हर जर्रा 
भोली पगली छल पथ निहारती है
चमक रही हीरकनी नियति जाल में 
डगर डगर तरुणाई संवारती है
समझती सुधा जहर भरे प्याले को
अनवरत चली सुधबुध बिसारतीहै
अंतर्मन बसती है रे कस्तूरी
फिर शील संयम को क्यों बिसारती है
-- ज्योत्सना सक्सेना

तन्हाई

दिल पुस्तक पन्ने फड़ फड़ फड़क रहे हैं 
अक्षर अक्षर मनमर्जी को मचल रहे हैं 
तनहा चाँद हुआ खामोशी बात करे
बारिश गीतों की , आंसू छलक रहे हैं 
-- ज्योत्सना सक्सेना

विश्व पर्यावरण दिवस पर कुछ दोहे

नेपाल त्रासदी पर कुछ दोहे :
===================
धरती सिसकी ले रही , पनपे कैसे फूल 
क़दमों नीचे बिछ गए , देखो खुद के शूल
माया के जंजाल में , पाया ना संतोष 
मानव मन से सोच ले , कुदरत का क्या दोष
पर्वत धरती खोद दी , हरपल फिर करतूत
मानव ढेरी है पड़ी , जैसे हो शहतूत
करुणा माँ पर रख सको , जो रत्नों की खान
भू को श्रृंगारित करो , ना दो जख्म निशान
-- ज्योत्सना सक्सेना

बुधवार, अप्रैल 01, 2015

काग बोले अटरिया

गीतिका के छंद सा मन , माथ टीका सज गया
मोरपंखी भाव सजना , ह्रदय साज बज गया
क्यों गए परदेस साजन काग बोले अटरिया
बरस करके एक बादल बात सारी कह गया
राग भरा दर्द सारा आखर आखर लिख गया
प्यार का सन्देश पाकर , धार काजल बह गया
रात नीले पंख सवार दे रही है दुहाई
समझ विवशता मेरा दिल पाषाण बन सब सह गया
चटकती कलियाँ सुमन की गंध का देतीं पता
कर्तव्य रवि उग आया स्वप्न पुल अब ढह गया
-- ज्योत्सना सक्सेना .

गुरुवार, मार्च 26, 2015

याद

कलम घिस दी कागज़ पर , आई तेरी याद 
अक्स झांके तेरा ही , करता है फ़रियाद 
-- ज्योत्सना सक्सेना

मुक्तक

धरा ने थामा आस भरे माथे पे उजियारा 
सुर्ख ओढ़ने से कुदरत ने आस्मां को निखारा
प्रेम मनुहार ने कैदी बनाया रविराज को भी 
झुका गगन खंडखंड पिघला दम्भ काअंधियारा 
-- ज्योत्सना सक्सेना

एक श्रृंगारिक दोहा


बेमौसम बरसात और कृषक की संवेदना ....

बेमौसम बरसात और कृषक की संवेदना 
******************************************
तड़कती बिजली 
गरजते बादल 
नयनो में ढलते 
टूटते स्वप्न आस का
टूटा था कांच
बूंदों की किरचें चुभ रहीं
सुलगते खेत देख
रो रहा किसान ---
बहती मिटटी उगल रही
हताशा का संसार
ताश सा थरथराने लगा
उम्मीद भरा महल आलीशान
सुलगते खेत देख
रो रहा किसान ---
दाने दाने सुबक रहे
पूछे अपना मोल
सरसों भटकी राह अपनी
जीरा रोया जार जार
कर्ज ने कतरे पंख
हौसलों के
सुलगते खेत देख
रो रहा किसान ---
कठिन श्रम
ना छुट्टी ना त्यौहार
एक बार फिर जुटना होगा
पुनः कर्मरथ चढ़ना होगा
सूर्य तुम्हे झुकना होगा
तपकर मेरी उम्मीदों पर
एक बार खरा उतरना होगा
आशाओं के दीप जलाता
उठ फिर खड़ा हुआ किसान
-- ज्योत्सना सक्सेना

सूरज गढ़ना जानती हूँ मैं .....

अश्रु सागर में बेचैन लहरे छिपाना जानती हूँ मैं
संघर्ष शूल सृजन पुष्पों में बदलना जानती हूँ मैं
तन्हाइयों में भी गीतों का आगाज़ कर सकती हूँ
शब स्याही निगल नया सूरज गढ़ना जानती हूँ मैं
-- ज्योत्सना सक्सेना

दोहे: घर या मकान

भाव समर्पण हो जहाँ , सुन्दर बने जहान
प्रेम सेतु झूले पड़े , कहते उसे मकान
दिल से मिलते दिल यहाँ ,मिटे शोक अवसाद 
मिले उदासी को यहाँ , मीठा मीठा स्वाद
सद्कर्मों की राह ले , सीखें सद्व्यवहार
संतोष सिखाते बड़े , लक्ष्मी आये द्वार
देह को पहचान मिली , निश्छल बरसे प्यार
जीवन लक्ष्य सफल हुए , स्वप्न होंगे साकार
दिल में दूरी बढ़ गई , ज्यों बड़े हुए मकान
मौन मौन के खेल में , रिश्तों के शमशान
-- ज्योत्सना सक्सेना

muktak

करुणा सम बोध अपार हो 
आत्मिक प्रेम विस्तार हो 
कुदरत मिजाज़ अनुकूल रहे 
खिले उमंगों के कचनार हो 
 -- ज्योत्सना सक्सेना

.इन्द्रधनुषी ख्वाब


कुछ घाटी के इधर 
कुछ पर्वतों के उधर 
इन्द्रधनुष ने बो दिए
आशा के सपनीले रंग
साँसों में महकने लगी
फूलों भरी भीनी सुगंध
बैंगनी सी निंदिया हुई
जामुनी हुए सलोने ख्वाब
अनंत गहराइयों भरा …
नीला आसमान….
हरी हुई वसुंधरा …
फसलों से मालामाल
पीली पीली सरसों चटकी,,,,
अवनि अम्बर का ….
मौन मिलाप ….
नारंगी अरु झूमते पुष्प
पुलकित दुल्हन सी सांझ
देखो जरा भास्कर का हाल
छिटका कर सिन्दूर भर दिया
धरती हुई लाज से लाल ,,,,
- ज्योत्सना सक्सेना

एकलयता में घुलमिल जाएँ ,,,,

आओ ,,, 
घुल मिल जाएँ ------
प्रकृति के संग
कर्मठता के
गान गायें
सूर्य चन्द्रमा
धरा , पहाड़
साधना सेवा की
थिरकन में
घुल मिल जाएँ -----
आनंद ही आनंद
परम चैतन्यकण में
अलौकिक कम्पन्न में
घुलमिल जाएँ------
नृत्यतरंगो संग
नवजीवन के
आशा प्रवाह की
जीवंत निर्झरणी में
घुलमिल जाएँ -------
धरती से आकाश तक
भीतर के नन्हे को जगाकर
प्रभु संग ताल मिला आएं
चलो मुस्कुराएं
दम्भ को भूल जाएँ
मैं को हम बनाकर
एकलयता में
घुलमिल जाएँ -----
-- ज्योत्सना सक्सेना

सोमवार, मार्च 09, 2015

doha '' mahila diwas par''

महिला दिवस पर एक प्रयास ---
दुशासनों की भीड़ में , श्याम को मत पुकार 
काली माँ का रूप धर, कर इनका संहार 
-- ज्योत्सना सक्सेना

कुछ दोहे और ''फाग ''पर ,,, सुधिजनो का मार्गदर्शन अपेक्षित *****************************************************************


बैर भाव सब भूलकर , खूब बजाओ चंग
होली के हुड़दंग में , चढ़े प्रेम की भंग
किंशुक कुसुम में चटके , तरुणाई का रंग
सुर्ख रंग से तन रंगे , मन में बसे उमंग
वृन्दावन में मन बसे , कान्हा का हुड़दंग
राधा पी की बावरी , ठुमके कृष्णा संग
जाम छलकाए मेघ रे , मदिरम फाग समीर
हिरणी सी रास्ता तके , सजनी हुई अधीर
-- ज्योत्सना सक्सेना

सोमवार, मार्च 02, 2015

कुछ दोहे ''फाग ''पर ,,, सुझाव आमंत्रित
******************************************
गालों में टेसू खिले , हृदय बज रहे साज
चूनर सीली हो गई , बेसुध नाचूं आज
आलिंगन करती लगे , ये फागुनी बयार
गुनगुन करता अलि करे, छेड़छाड़ सिंगार
भंग चढ़े बिन ही पिए , ऐसा पी का संग
अंग-अंग सावन करे , लगा-लगाकर रंग
पवन हुई मदहोश सी , मँजरी गावे गीत
नीम आम बौराय से , खिली हुई थी प्रीत
छलक छलक मदिरा गिरे , नैनों से चितचोर
सरक सरक चूनर गिरे , मिले न कोई छोर
-- ज्योत्सना सक्सेना

सोमवार, फ़रवरी 23, 2015

धुंध

रिश्तों की धुंध पर प्यार का सूरज छाएगा 
भ्रम के कुहासे को पल में निगल जायेगा 
ह्रदय साज पर बज उठेंगे फिर जलतरंग 
मीत सुहानी  सी इक ग़ज़ल गुनगुनाएगा 
-- ज्योत्सना सक्सेना

मंगलवार, फ़रवरी 17, 2015

इक कविता ---

मन की अलमारी के 
कपाट बंद कर 
लगाना चाहती हूँ 
ताला---------------
तेरी खुशबुओं में 
डूबी इबारतें
चाहती हूँ
रखना
गुलों के मानिंद
बंद डायरी की
शक्ल में --------
लगाना चाहती हूँ
पहरा तेरी यादों की
तिज़ोरी पर
पर ये दर्द भरे
सैलाब
तेरी प्रीत के -------
खुशबुओं के रेले
तेरे गीत के-------
तनहा सुरमई सांझों में
तोड़ तटबंध
बह निकलते हैं------
और घुलती उनमे
तेरे खतों की इबारतें 


भूल जाती हूँ
सारे वादे इरादे तेरे----
और ढल जाती
मेरी प्रीत
नए शब्दों की
शक्ल कर इख़्तियार
बन जाती है
इक कविता -------
- ज्योत्सना सक्सेना


मन की अलमारी के 
कपाट बंद कर 
लगाना चाहती हूँ 
ताला---------------
तेरी खुशबुओं में 
डूबी इबारतें
चाहती हूँ
रखना
गुलों के मानिंद
बंद डायरी की
शक्ल में --------
लगाना चाहती हूँ
पहरा तेरी यादों की
तिज़ोरी पर
पर ये दर्द भरे
सैलाब
तेरी प्रीत के -------
खुशबुओं के रेले
तेरे गीत के-------
तनहा सुरमई सांझों में
तोड़ तटबंध
बह निकलते हैं------
और घुलती उनमे
तेरे खतों की इबारतें
भूल जाती हूँ
सारे वादे इरादे तेरे----
और ढल जाती
मेरी प्रीत
नए शब्दों की
शक्ल कर इख़्तियार
बन जाती है
इक कविता -------
- ज्योत्सना सक्सेना