ज़िंदगी की शाम
एक अनाकार का
उष्ण पैगाम
दिल दरीचे में
हरहराता समंदर
किवाड़ों की सांकल खोली
प्रार्थना स्वरों ने
चप्पे चप्पे धुल गई
मन क्यारी की धूल
धड़कन धड़कन सज गया
आस्था का तरंगित साज
सकारात्मकता से
दैदीप्यमान ओजस्वी हुआ पोर पोर
कृत्रिमता से तोड़ा रिश्ता
रूहानी प्रेम की व्यापकता में
विचरती नर्तन करती
अलौकिकता के मुक्त ओमकार के
नाद में बेसुध उल्लसित डूबती गई मैं
-- ज्योत्सना सक्सेना
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