पिता का प्यार
पिता के रूप में जब हम किसी पुरुष की कल्पना करते हैं तो एक साहसी , ऊर्जावान, रौबीला, शक्तिशाली सा व्यक्तित्व नजर आता है..जो कि घर का मुखिया होता है..
इसका कर्तव्य है घर कि भौतिक सुख- सुविधाओं में वृद्धि करना और बच्चों को अपने व्यक्तित्व से अनुशासन का मार्ग दिखाना I जबकि माँ से आज के युग को ढेरों अपेक्षाएं हैं..
माँ जीवन पर्यंत अपनी स्नेहिल छाँव में बच्चे का विकास करती है..घरेलू कामकाज के साथ साथ बाहर के कार्य भी अधिकांशतः स्त्रियाँ आज पुरुषों कि तरह ही कर रहीं हैं..तभी शायद बच्चे पूरी जिंदगी माँ के चुम्बकीय ममत्व से आकर्षित रहते हैं..
भावनात्मक रूप से स्त्री व पुरुष में कुछ बुनियादी अंतर होता है..प्रकृति ने स्त्री को ममता का स्वरुप तथा पुरुष को शक्तिशाली स्वरुप प्रदान किया है..जब बच्चा माँ के गर्भ में रहता है...तभी से उसे माँ के रूप में सुरक्षित आश्रय मिल जाता है..जो कि निरंतर निर्बाध गति से उसे पूरी जिंदगी स्नेह, वात्सल्य और ममता के रूप में प्राप्त होता है..
पिता का प्यार पृष्ठ का पिछला हिस्सा है..जहाँ माँ स्नेह रस की वर्षा से बालकरुपी पौधे का सिंचन करती है..वहीँ पिता के कार्य उसे बाह्य जगत से परिचित कराते हैं ..पिता का प्यार बालक कि बुद्धिजीविता को जाग्रत करता है..बालक को अपनी सीमाओं में नियंत्रित रहकर अनुशासन की परिधि में रहना सिखाता है..
माँ केवल बच्चे के पालन पोषण के लिए जिम्मेदार है..यह धारणा सर्वथा गलत है..पिता के सही दिशा निर्देश..माँ का स्नेह मिलकर ही बालक के व्यक्तित्व को पूर्णता प्रदान कर सकते हैं,,
- ज्योत्सना सक्सेना
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