आज लैपटॉप में तकनीकी खराबी के कारण विवश होकर प्रकृति की गोद में जा बैठी..क्षितिज को अरुणिम करता सुर्ख सूरज..शीतल बयार में मस्त झूमते पेड़..जिसकी टहनी में इतराती इठलाती गौरैया..दूर कहीं कोयल की कुहू..कुहू..मानो सन्देश दे रही हो..-''क्या स्वर्गिक दैवीय सुख नहीं खो रहे हम..''
असतो मा सदगमये ..तमसो माँ ज्योतिर्गम्ये..
हे ईश!! हमें अँधेरे से उजाले की ओर ले चलो..आज हमारे पारिवारिक रिश्ते नितांत एकाकी,खोखले और स्पन्दनहीन हो चुके हैं..परिवार से ज्यादा सहभागी हम अपने मित्रों कोबनाते हैं..आज प्रत्येक व्यक्ति आप पर अपने भाव उडेलना चाहता है..अवशोषित या ग्राह्य करने का भाव तिरोहित हो चुका है शायद..हमें सुनना भी आना चाहिए मित्रों..तभी हम शक्तिशाली , स्वस्थ और आनंददायी संबंधों की भीनी खुशबू को अनुप्राणित कर सकेंगे ..हर भारतीय को पारंपरिक विरासत के रूप में आध्यात्म का कुछ न कुछ अंश मिला है..जो हमारे अवचेतन मन की परतों में घुला है..उसके भीगेपन के एहसास को पाने के लिए हमें प्यार करना होगा खुद से..कुदरत से..कुदरत की प्रत्येक वस्तु से..देखना आप एक अलौकिक आनंद से रच बस जाओगे..खुद तो मह्कोगे ही..अपने इर्द गिर्द खुशियों की सुरभि बिखेरोगे.. सच ही कहा है किसी ने..
खुदा की शान तुझमे..छिपे भगवान तुझमे..
- ज्योत्सना सक्सेना
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