नित्य की भांति आज भी साँझ आई
नववधू सा श्रंगार कर भी एक उदासी सी लाई
पश्चिमी क्षितिज के लाल रंग में
दिखी वियोग की परछाईं
वियोग की वे रश्मियाँ वेदना का सुप्त सौंदर्य लाई
वही सुहागन सा सिन्दूरी रंग
महकती थी तरुणाई
लगता था किसी ने नववधू के अरमानो की रक्तिम चिता जलाई |
नववधू सा श्रंगार कर भी एक उदासी सी लाई
पश्चिमी क्षितिज के लाल रंग में
दिखी वियोग की परछाईं
वियोग की वे रश्मियाँ वेदना का सुप्त सौंदर्य लाई
वही सुहागन सा सिन्दूरी रंग
महकती थी तरुणाई
लगता था किसी ने नववधू के अरमानो की रक्तिम चिता जलाई |
-- ज्योत्स्ना सक्सेना
