मंगलवार, मई 01, 2012

सांझ आई

नित्य की भांति आज भी साँझ आई
नववधू सा श्रंगार कर भी एक उदासी सी लाई
पश्चिमी क्षितिज के लाल रंग में
दिखी वियोग की परछाईं
वियोग की वे रश्मियाँ वेदना का सुप्त सौंदर्य लाई
वही सुहागन सा सिन्दूरी रंग
महकती थी तरुणाई
लगता था किसी ने नववधू के अरमानो की रक्तिम चिता जलाई |

-- ज्योत्स्ना सक्सेना       

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