दर्पण से आज
बेहिसाब बातें की
तुम्हारे प्रतिबिम्ब को
मुस्काने दीं
प्रतीक्षा के इस मधुर क्षणों में
सिर्फ तुम ही थे तुम ---
सलाई से आंखों में आंजना काजल
भरे सावन मेघों सा गरजना
प्रेम की नमी का ठहरना
इस पर चाहत का विश्वास
चटकती भोर से उम्मीद -----
चाहत के,समर्पण के
हर पलों में तुम्ही थे
सूरज की लालिमा
हंसने की चाह में
सिर्फ तुम ही थे
मेरे सिर्फ मेरे--
प्रेम का शर्मीलापन
ओस की बूंद सा है पारदर्शी
तुम्हारे
प्रेम के दो बोल
कानो में लटकते झुमकों
नाक की नथनी
माथे की बिंदिया
से दमकते हैं
प्रतीक हैं
तुम्हारे होने का
क्योंकि सिर्फ तुम हो
मेरे जीवन के पलों में -----
मेरे मन के आइने में
केवल तुम थे
सिर्फ तुम थे-----
-- ज्योत्सना सक्सेना
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