सलाइयों के साथ
एहसासों के गलियारे से
उलझने सुलझाईं
प्रिय के भावों संग
सफ़र रंगबिरंगे ख़्वाबों का
हुई ऊन से बुनाई
फंदा फंदा कह रहा
मिट जाओ , जियो दूसरों के लिए
अहम् को दो बिदाई
संघर्षित जीवन में
अपना निजत्व प्रिय के लिए
सृजन की अमराई
पोर पोर उंगलियां
सलाइयों संग डांडिया रास
राधा सी इतराई
घटते घटते फंदों ने
मानो मुक्ति पथ पर कान्हा संग
विस्तार बिंदु है पाई
-- ज्योत्सना सक्सेना (२४-१-१४)
एहसासों के गलियारे से
उलझने सुलझाईं
प्रिय के भावों संग
सफ़र रंगबिरंगे ख़्वाबों का
हुई ऊन से बुनाई
फंदा फंदा कह रहा
मिट जाओ , जियो दूसरों के लिए
अहम् को दो बिदाई
संघर्षित जीवन में
अपना निजत्व प्रिय के लिए
सृजन की अमराई
पोर पोर उंगलियां
सलाइयों संग डांडिया रास
राधा सी इतराई
घटते घटते फंदों ने
मानो मुक्ति पथ पर कान्हा संग
विस्तार बिंदु है पाई
-- ज्योत्सना सक्सेना (२४-१-१४)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें