मंगलवार, फ़रवरी 11, 2014

मुक्ति पथ

सलाइयों के साथ 
एहसासों के गलियारे से 
उलझने सुलझाईं

प्रिय के भावों संग 
सफ़र रंगबिरंगे ख़्वाबों का 
हुई ऊन से बुनाई

फंदा फंदा कह रहा
मिट जाओ , जियो दूसरों के लिए
अहम् को दो बिदाई

संघर्षित जीवन में
अपना निजत्व प्रिय के लिए
सृजन की अमराई

पोर पोर उंगलियां
सलाइयों संग डांडिया रास
राधा सी इतराई

घटते घटते फंदों ने
मानो मुक्ति पथ पर कान्हा संग 

विस्तार बिंदु है पाई

-- ज्योत्सना सक्सेना (२४-१-१४)

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