मंगलवार, जून 14, 2016

घुँघरू तितलियाँ के ,,,,

तितलियाँ बाँध के घुँघरू ,निराली बन ठुमकती है 
बदलियाँ जाम से भारी , निगाहों पे छलकती हैं 
चली है तोड़ के बंधन , नदी सागर से मिलने को 
ढली हो शिल्प में जैसे ,बिना ठहरे ही चलती है 
घटायें चूमती पर्वत , हवा भी बावरी ग़ाफ़िल 
घने जंगल में जुगनू थे , दिवाली खूब हंसती है
किताबों में छिपे ख़त थे ,गुलाबों रंग छाये थे
सलामत पुल था यादों का ,लहर धड़कन मचलती है
हिना में नाम था उसका ,छिपा साजन सलोना सा
चुराए रंग कुदरत ने , दुआओं में महकती है
मंजीरे से लगे पत्ते , लबों में घुल गया शरबत
उदासी हो गई पतझड़ , बहारें मन चहकती हैं
--- ज्योत्सना सक्सेना

शुक्रवार, जून 10, 2016

प्रेम

प्रेम 
*****
गूंगे गुड सा शब्द है , तटबंध ना दीवार 
कलकल निर्झर सा बहे , पावन सा त्यौहार 
पावन सा त्यौहार , चांदनी देती पाती 
नयनों बसता चाँद , गीत हैं लहरें गाती
ज्योति बुझी है प्यास , रतन से तारे मूंगे
धुन में मगन पलाश , बौर आम हुए गूंगे
-- ज्योत्सना सक्सेना

फाग छाया -

फाग छाया -
************
मौसम करे ठिठोली , साजन करे चिरौरी
थोडा गुलाल मल दूं , रंगीला फाग छाया
बादल नहाए रंग से , धरती भिगोए आँचल
कोयल कुहक रही है , मादक सा फाग छाया
मदिरा भरी सुनहरी ,ये बालियाँ सदा सी
ओढ़े चुनरिया सरसों , इठलाता फाग छाया
बौछार राग तरणी , आलोक मीठा चितवन
पुलकित हिया जहां का , चहुँ ओर फाग छाया
मदहोश हैं कुमुद दल , अनुराग से भरे हैं
अभिराम सी छटा है , अनमोल फाग छाया
-- ज्योत्सना सक्सेना 

गज़ल की शरारत

चाहतें धड़कन बनी थी गुनगुनाती सी लगी 
तीरगी में बन सितारा जगमगाती सी लगी 
आजमा के देख ले फिर इश्क़ करता मुझसे ही 
लाख तू नज़रें छिपाए मुस्कुराती सी लगी 
बेख़ुदी है इश्क़ की जो होश में हैं हम नही 
आग लगने पर फसल दिल लहलहाती सी लगी
गज़ल की देखो शरारत शे'र लब पे लिख दिए
शोख आँखों शायरी खुद खिलखिलाती सी लगी
बेख़बर नादान सा था तोड़ता था दिल मिरा
भूल उनकी ज्योति तुझको फिर सताती सी लगी
-- ज्योत्सना सक्सेना

मौन निमंत्रण

हिम तनया प्रस्तर अंतस से निकली गंगा गीता हूँ 
प्रेम पगी मैं सरल सहज भारत की पावन सीता हूँ 
मौन निमंत्रण चैतन्य मिलन भवसागर से तरना है 
परम इबादत करने सागर घुलने चली पुनीता  हूँ 
-- ज्योत्सना सक्सेना

बेटियां

हिम नग ऊंची सागर गहरी -- बेटियां 
शून्य विराट सभी कुछ तो हैं -- बेटियां 
आत्मबल संकल्प बसा जिसके भीतर 
साहस क्षमता समाधान हैं -- बेटियां 
-- ज्योत्सना सक्सेना

होली की चुहल

लगाकर रंग जीजा को ,छिपी बक्से तले साली 
धरा था वेश काली का , दिदीया दे रही गाली 
धुलाई जो हुई जीजू तरेरी आँख बहना पर 
दिखे दिन चाँद तारे , दिलाई याद दीवाली 
-- -- ज्योत्सना सक्सेना ,

युवराज सलोना

नदिया देखी परबत देखे बांचा खेत नगर का कोना 
नीले निभृत नभ आव्हान मुझे साहस सपने है बोना 
ले आयु पंख उन्मुक्त चला मैं नभ लिपियों को पढने 
बादल फाहे भर मुट्टी गीत गुनूँ मैं युवराज सलोना 
-- ज्योत्सना सक्सेना .

एक दोहा

ढाई आखर में छिपा , करुणा सेवा तत्व 
भाव अहम जो खो गया , पाया मन दिव्यत्व 
-- ज्योत्सना सक्सेना

होली की रचना

रंगरंगीली होरी आई 
रसरसीली छो ,,,, री 
अलगोजा और चंग बजे रे 
सजणा नीयत डोली ,,,,
दादुर मोर पपीहा चहके 
फुदके आँगन गौरैया
कामदेव रति रिझावें
मन फूटें फुलझड़ियाँ
रंगरंगीली होरी आई
रसरसीली छो ,,,, री
अवध में बन रही
कनक की गुझियाँ
जैपर घेवर साजे
मस्तानो की टोली
खुलके रंगभंग की छाने
रंगरंगीली होरी आई
रसरसीली छो ,,,, री
बिजुरी चमके जियरा हरसे
चंचल अल्हड़ टोली
नैन मटक्का कर ले गोरी
झूला इमली डारी
रंगरंगीली होरी आई
रसरसीली छो ,,,, री
शिव डमरू सा मन डोले है
थिरके पग ता ता थै,,, या
कान्हा नैनन की पिचकारी
दिल बाजे शहनई,,, याँ
रंगरंगीली होरी आई
रसरसीली छो ,,,, री
-- ज्योत्सना सक्सेना

घुलमिल जाएँ -----

आओ ,,, 
घुल मिल जाएँ ------
प्रकृति के संग
कर्मठता के
गान गायें
सूर्य चन्द्रमा
धरा , पहाड़
साधना सेवा की
थिरकन में
घुल मिल जाएँ -----
आनंद ही आनंद
परम चैतन्यकण में
अलौकिक कम्पन्न में
घुलमिल जाएँ------
नृत्यतरंगो संग
नवजीवन के
आशा प्रवाह की
जीवंत निर्झरणी में
घुलमिल जाएँ -------
धरती से आकाश तक
भीतर के नन्हे को जगाकर
प्रभु संग ताल मिला आएं
चलो मुस्कुराएं
दम्भ को भूल जाएँ
मैं को हम बनाकर
एकलयता में
घुलमिल जाएँ -----
-- ज्योत्सना सक्सेना

बुढापा है थका देखो

इबारत जब नई देखी उतारे हम बलाएँ हैं
कभी चाहत सजाई अब नजारा सूना पाए हैं
घड़े से रिस रहा पानी चुकाते कर्ज जायेंगे
लियें हैं हाथ में पत्थर घरों शीशे जड़ाए हैं
बड़ी ही शान से भेजा विदेशों में लला पढ़ ले
बुढापा है थका देखो , दरों नजरें टिकाएं हैं
लगी है आग पानी में बिके है ख्वाब रद्दी में
नशे में हूँ नही बिलकुल दिलों उसको बसाए हैं
खताएं माफ़ करती हूँ गिला कुछ भी नही उनसे
लकीरें हाथ में मेरी लिखा वो नाम आए हैं
बता दे ज्योति प्यारों को हकीकत जान लेती हूँ
कलेजे का ही टुकड़ा है खुदा सा मन बसाए हैं
-- ज्योत्सना सक्सेना

तलाश

देख दिल आज मिल गए अपने
जो भी देखे थे सच हुए सपने
जीतते सफ़र तय किया हमने
फूल गजलों लगे हैं खिलने
बाग़ लगने लगे थे क्यूँ सहमे
मौज ए गुल लगे अभी हंसने
अजनबी बेवफा माना जिसने
नाम मेरा रटे लगे जपने
पूछती ज्योति परवाने तुझसे
जीत कर क्यूँ तलाशती अपने
-- ज्योत्सना सक्सेना

हिमालय में गंगा चढ़ा आयें

उफनते सिंधु से चलो आँख मिला आयें
काले मेघों में इश्क़ का चाँद खिला आयें
नन्ही खुशियों के मयूरी उपवन में
इक चमकीली पोशाक सिला आयें
जमुना तीरे कदम्ब के पेड़ तले
कन्हैया संग रास रचा आयें
हाथ में हाथ रखो साथियों
हिमालय में गंगा चढ़ा आयें
बाधाओं को पार करो अपने हौसलों से
क्यूँ ना नाम अपना आस्मां पे लिखा आयें
कड़वे घूँट पी लिए बहुत ज्योत्सना
अमृत कुछ जहरीलों को पिला आयें
-- ज्योत्सना सक्सेना

नव रश्मि दीप

देख हिमालय गल रहा 
अंतिम प्रहर छल रहा 
पार उधर अब चल चलें 
नव रश्मि दीप जल रहा 
-- ज्योत्सना सक्सेना...

शून्य में लापता हो गये हैं हम

शून्य में लापता हो गये हैं हम
--------------------------------
नदी में फेंकते थे जब
मेरे नाम का कंकड़
पानी की हिलोरों के संग 
डूब जाया करती थी मैं
बहुत गहरे तक
तुम्हारे साथ----
मेरे लिखे खतों को
सहेजकर रखते समय
कहते थे
मलय सी महकती हो
शब्दों से निकलकर----
मैं तुम्हारे अहसासों की जमीन पर
ध्यान मुद्रा में बैठकर
करती हूँ
प्रेम का जोड़-घटाना
यादों का गुणा- भाग
सच तो यह है कि
यथार्थ के धरातल पर
शून्य में लापता हो गयेंये हैं हम--
ज्योत्सना सक्सेना
--

नमन परम को

हौले से चली आई 
मद्धिम शाम सूनी सी 
थरथराती लौ भभकी थी 
पवन रुख थी बदलती सी 
चलो आओ चले हम 
कुछ नए दीप जलाते हैं
दिशा हम भी बदल लेवें
पवन थमती नही देखो
स्मृति आँगन में झर गए
हरसिंगार चुनते हैं
प्रगति क्षितिज पे आरूढ़
ध्रुव तारे को चुनते हैं
उत्कंठित मौन पुकारे है
नवल सोपान रचते हैं
सडक का रोकता जलभ्रम
धवल शतदल खिलाते हैं
श्रम के स्वेद बिंदु से
नमन परम को करते हैं ,,,,,
-- ज्योत्सना सक्सेना 

मधुशाला

धरती के हाथों में फूलों की है माला 
मदहोशी में रत्नाकर भरता है प्याला 
तारे करते चम चम मोती मीनाकारी 
उल्लासित नभ रचता नूतन इक मधुशाला 
-- ज्योत्सना सक्सेना

बेटी

रंगोली बनाती धरा जो सजाये 
बहारें खिलाती सखी बन वो आये 
ख़ुशी में बदल दे ग़मों की बदलियाँ 
रसीली छबीली कली मुस्कुराये
उजाला खिला दे अँधेरा मिटाकर 
जले दीप हर घर दिवाली मनाये
मुखौटे लगाए दिखे थे बहुत से
उदासी हटाये परी सी हँसाए
ठुमकती चले वो छमाछम छमाछम
चढ़ी गोद सबके दुआएं मुस्काएं
मुसाफिर सभी हैं सफर है कठिन सा
कदम कुछ मुहब्बत के हम मिल बढ़ाये
सुहाना हो मौसम नए गीत रच दे
पपीहा दिवाना सा मल्हार गाये
ख़ुशी ज्योति झूले झुलाती है हर पल
दुखों को हमेशा भुलाते जो आये
-- ©ज्योत्सना सक्सेना

बातें

कुछ मीठी कुछ प्यारी बातें
भूले सारी खट्टी बातें
आये जब से दिल में साजन
नैनों की दीवानी बातें
करते वो सपनो में मुझसे
सन्दल सुरभित निखरी बातें
भीगी पलके सुलझी अलकें
मोती सी ग़ज़ल भरी बातें
चूड़ी बोले बिंदिया दमके
चाहत की ज़ज्बाती बातें
कानों में पुरवाई बोली
शर्मीली बहकाती बातें
ज्योति हवा का रुख पहचानो
आँखे बोलें दिल की बातें
-- ©ज्योत्सना सक्सेना

चिरविजयिनी हूँ..

ये कैसा नाजुक वक़्त है...
जो काटे नही कटता ..
पराजित होकर भी..
लगता है..
चिरविजयिनी हूँ..
इस विजय में भी..
एक हार है..
कभी यूँ लगता...
जीतकर भी परास्त हूँ..
हारी हूँ या जीती हूँ...
ये तो तुम ही जानो..
हारी तो तुम्हारे लिए..
जीती हूँ ..
तो भी तुम्हारे ही लिए ...
- ज्योत्सना सक्सेना

ठगनी नगरी

अनचीन्ही जीवन राहो में 
मनुज निपट अकेला है ---
जड़ बनता चैतन्य 
चैतन्य पुनः जड़ 
समय चक्र का फेरा है 
तमस तड़ाग में
ज्योतिर्कमल खिलाओ
मुक्ति भोर की बेला है ---
चलो आओ
प्रभाती गाओ
अंतर्मन स्व
छिपी अनुभूति
बनअकिंचन कण
परम रज पाओ
अलौकिक शांति
निर्झरण अंदर है
बाहर कोलाहल झमेला है ---
अनुरागी मन ले चलो
क्षितिज़ परे
मधु यामिनी चख आओ
साक्षी बन चित्त टटोलो
अतृप्त कामना समन्दर
तन नमक का ढेला है ---
सिंचित करो
अग्निशिखा से मन
मिथ्या आबनूसी अहम्
घटायें हटाओ
जीवन कठपुतली का खेला है ---
प्रदीप्त अदृष्ट अगोचर देखो
दुर्लभ यात्रा पर हो आओ
ज़र्द झुर्रियों को
स्वर्णिम हर्फों से
सजा आओ
रिश्तों के जंगल ना भटको
ठगनी नगरी में लेन देन का मेला है --
-- ©ज्योत्सना सक्सेना

मधुमयी हुई पुरवाई

रिश्तों की भरी जेठ दुपहरी , छंदित मधुमयी हुई पुरवाई 
सावन की बदली चटकी थी , छू ली किसने मन अमराई 
तन्हा-सांझो की पीर भूल, बांटे गीत कोयल मतवाली 
मुरझाया मन हुआ गुलमोहर सुप्त भावों ने ली अंगडाई 
--- ©ज्योत्सना सक्सेना

स्त्री हूँ मैं

स्त्री हूँ मैं 
************
द्वैत अद्वैत क्या है 
ना जानती थी 
रिश्तों की पूरक हूँ 
सप्तपदी के वचनो को
समझ सकी थी इतना ही
आधे भरे हो तुम
आधे को भरना है मुझे
नही जानती थी
रिसते अधूरेपन को भरने की
परीक्षा दे रही हूँ ...
आशाओं का अंकुरण करती
छलती रही अपना ही मन
रिश्तों के मिथ्या वनों में
पल्लवित होती रही हरियाली
खिलाती रही निष्ठा के वासंती पुष्प
भ्रमरों से बचाती रही अपना अस्तित्व
रिश्तों को सुलझाती कलकल निनाद करती
अहम सागर में निष्ठा के रंग उड़ेलती रही मैं
खारेपन में समर्पण मिठास भरने का अथक प्रयास करती
बिना अर्धविराम की चाह में पूर्णत्व की ओर बढ़ती रही मैं ....
-- ज्योत्सना सक्सेना

माँ

माँ 
दिया अँधेरे दिखा रही है 
गमों में खुशियाँ जता रही है 
क़रार पाती दुआएं उनकी 
चमकती आँखें बता रही है 
हवाओं चन्दन बिखर गया था
यकीन खुशबू दिला रही है
दिखाई देती चंदा में सूरत
धड़कने लोरी सुना रही है
यहीं कहीं हो दिलो हमारे
छनकती पायल बजा रही है
-- ज्योत्सना सक्सेना

तितलियों की बस्ती --

जीवन भंवर में संभालनी पड़ती है मन की कश्ती 
खुरदुरी ज़मीन में नही मिटती ख्वाबों की हस्ती 
ए नादाँ दिल तेरे दम पे ही तो बसाई है मैंने 
मन चमन में फूलों और तितलियों की बस्ती 
-- '' ज्योत्सना सक्सेना ''

कलम

कलम
~~~~~
कभी ललकार लिखती है कभी श्रृंगार सजती है 
कभी वो ओस से कोमल कभी तलवार बनती है 
हिय उदगार माँ बाबा गुरु अनुदान हो जैसे
भाल आदित्य बन अक्षर अंधियारा हरती है
-- ज्योत्सना सक्सेना

संवादों की चाहत

रीता है मन पनघट हर लम्हा आहत है 
सूनी पगडंडी पर तेरी ही आहट है 
साँसों में घुटते बिरहा गीतों को साजन 
तेरी ही धुन से संवादों की चाहत है 
-- ज्योत्सना सक्सेना

ओ चिड़िया रानी

ओ चिड़िया रानी 
******************
मेरे अंगना आओ चिड़िया रानी
जी भर दाना खाओ चिड़िया रानी 
जीवन का रेला,,,,,, है ठेलम ठेला 
बूंदों नहलाओ ओ चिड़िया रानी
थकती ना थमती सदा है फुदकती
उड़ के मत जाओ ओ चिड़िया रानी
तिनके से आले में घर जो सजाती
आँखे सहलाओ फिर चिड़िया रानी
मिटटी के गड्ढे बरगद हिंडोला
चहचहाओ नहाओ चिड़िया रानी
थोडा सा दाना थोडा है पानी
कहाँ हो कहाँ हो ओ ! चिड़िया रानी
-- ज्योत्सना सक्सेना

रेशम के कोकून में बंद ज़िंदगी

तपती धूप से 
छाँव मांग रहा है 
आदमी ------------
पाषाणों से 
भाव मांग रहा है 
आदमी -----------
रेगिस्तान से
तृप्ति मांग रहा है
आदमी ----------
अंतस के
कोलाहल से
मौन मांग रहा है
आदमी --------
इमारतों के
जंगल में
पनाह मांग रहा है
आदमी---------
रेशम के
कोकून में बंद
ज़िंदगी से
सुकून
मांग रहा है
आदमी -----
--'' ज्योत्सना सक्सेना ''

दोहे --

साबुन से ये बुलबुले , पल में जाएँ टूट।
मायावी सा जग यहाँ , भावों की है लूट।।
वश में कर ले क्रोध को , थोडा हो जा कूल।
कांटो से गर पथ भरा , खिल जायेंगे फूल।।
छाया कितनी भी बड़ी , असली है किरदार।
रिश्ते होते तब बड़े , नीयत में हो प्यार।।
कागज़ बन कर ना उड़ो , किस्मत देगी मात।
हाथो डोर पतंग दे , बन प्रभु की सौगात।।
वादा जन्मों का किया , अगला पल अनजान।
भरम जिज्ञासा तोड़ के, नियति करे पहचान।।
हासिल कर लो काम को , किस्मत पर क्यों टाल।
जीवन में पहचान ले , रेत समय की चाल।।
== ज्योत्सना सक्सेना

दोहे -

धरती सिसकी ले रही , पनपे कैसे फूल 
क़दमों नीचे बिछ गए , देखो खुद के शूल
माया के जंजाल में , पाया ना संतोष 
मानव मन से सोच ले , कुदरत का क्या दोष
पर्वत धरती खोद दी , हरपल फिर करतूत
मानव ढेरी है पड़ी , जैसे हो शहतूत
करुणा माँ पर रख सको , जो रत्नों की खान
भू को श्रृंगारित करो , ना दो जख्म निशान
-- ज्योत्सना सक्सेना

श्रमिकों को समर्पित दोहे -

कंधे पर हैं बोरियां , सिर पर चढ़ती धूप।
सड़कों पर तब गाड़िया , बचता सूंदर रूप।।
माता पत्थर तोड़ती , झूले सोता लाल।
सिर पर खुद के छत नहीं, निर्मित करती मॉल।।
हाथों में है फावड़ा , थक कर होते चूर।
मालिक उनके खा रहे , लड्डू मोतीचूर।।
केवल इक दिन का नहीं , हर दिन हो सम्मान।
खूब तरक्की कर सके , पाएं पूरा ज्ञान।।
--- -- ज्योत्सना सक्सेना

मदिरा के वो जाम

इंद्रधनुष के भाव छोर पर मदिरा के वो जाम 
यादों के सुधि सावन से छलके उनके पैगाम 
क्षितिज फैली कामना तोड़ो माया भ्रम के जाल 
उदारमना बन पूर्ण करों प्रभु के दिए सब काम 
--- --- -- ज्योत्सना सक्सेना.

सीखा हमने

अचल अटल जादुई विश्वास पर्वत से ही सीखा हमने 
मुनि तपस्वी सा धीर धरना पर्वत से ही सीखा हमने 
रुतबे का कोई भान नही अहम गलाना सीख लिया
अंबर अवनि मिल जाये सूत्र जोड़ना सीख लिया हमने 
-- ज्योत्सना सक्सेना

सात सुरों की सरगम है माँ

सात सुरों की सरगम है माँ
हर दिल की धड़कन है माँ
दोहों में ना ढाल सकूँ मैं
चौपाई में ढूंढ सकूँ ना
सबसे ऊंची हस्ती है वो
हर दिल की धड़कन है माँ
मीरा सी माँ मूल चेतना
तुलसी जैसी पावन है वो
शिव मस्तक का चन्द्र है जो
हर दिल की धड़कन है माँ
भाव कलम सब बौने देखो
ओमकार की अनुगूंज हो
सृष्टि का स्पंदन प्रभु वास में
हर दिल की धड़कन है माँ
सात सुरों की सरगम है माँ
हर दिल की धड़कन है माँ
-- ज्योत्सना सक्सेना

सम्मोहन विराट का

सदियों से 
लबों में क़ैद 
बिखरने लगी 
वादियों में 
शब्द पातों की 
सरसराहट -----
डूबती उछलती
लहरों के बीच
जीवन समंदर
खोते लम्हों की
गुनगुनाहट-----
वक़्त की नज़ाकत में
गुँथी राग रागिनियाँ
संगदिल दरीचों से
आती शगुन हवाओं की
थपथपाहट -----
प्रीत के कच्चे रंगों की
पक्की निष्पत्ति
पछुआ धक्के से
लुढकता आदित्य
बालू के घरौंदों पर
जलराशि की खिलखिलाहट ----
मुखरित चैतन्य विस्तार
धुंधलाते बादलों पार
सीमान्त से किसी के आने की
सुनाई दे रही है
मद्धिम मद्धिम सी आहट -----
चिंतन मनन
नृत्यमग्न मयूरी बन
पल्लवित नवसृजन
पाकर काव्यामृत नवनीत
धरा भी गहन मौन से
लयबध्य हो चली
सम्मोहन विराट का या
नभ से मिलने की
अकुलाहट -----
--- ज्योत्सना सक्सेना

सांझ की सी दुल्हन..

जल जाते हैं पाँव ..
मेरे एहसासों की बर्फ से
सिक जाते है ज़ख्म मेरे..
अरमानो की मोम से...
छिड़क देते हैं...
.खुशबु ए तराने...वादियों में..
महक उठती हैं अमराइयाँ..
कुहक उठती है कोयलिया..
पिघलने लगते हैं..
.ज़ज्बातों के फूल...
झरते झरते गुलमोहर औ अमलताश...
कोमल पत्ते...गुनगुनाती पवन...
ओस का पत्तों पर नटराज सा नर्तन...
झूम झूम के गा रही....
केसरिया चुनरी ओढ़े ...
सांझ की सी दुल्हन..
- ज्योत्सना सक्सेना

बूँदों सा मल्हार

पायल की झंकार में , बूँदों सा मल्हार 
मन मोरा बस में नहीं , आओ प्राणाधार 
आओ प्राणाधार , मेघों डले हैं झूले 
बरखा गाती गीत , फूल हृदय में फूले 
ज्योति नयन अश्रुधार ,मन चातक हुआ घायल 
स्वाति नक्षत्र श्रृंगार ,चांदनी छम छम पायल
--- ज्योत्सना सक्सेना

महकते नग्मे...

उस शज़र के साये में आज भी खुशबू बिखरी है...
जहाँ छिडके थे कभी हमने, महकते नग्मे...
उस रात के सन्नाटे में स्याही आज भी बहुत है..
जहाँ छत पर बैठकर तोड़े थे तारे तुमने..
वह दरिया खिलखिलाता आज भी बहुत है...
दो बंद मुट्ठियों से डाले थे हरसिंगार उसमे..
चमकती है सुनहरे हर्फों से आज भी वो ज़र्द डायरी ..
दबाये रक्खे थे क्योंकि ख़त सारे तुम्हारे..
जलती है बर्फ सी .. जाने क्यूँ .. हथेली हमारी...
ढूंढती हैं क्यों.. अक्स उसमे आज भी तुम्हारा ज़ालिम...
- ज्योत्सना सक्सेना

चलो चले ,,,

अज्ञान भंवर की लहरों से निकल 
दुःख सुख की अविरल धारा संग 
कभी डूबते कभी तैरते 
सागर की ओर
बहते चलें ---------------------
गुजरा वक़्त गुजर गया
फिर विचार कैसा
नए नज़रिये को अख्तियार कर
नई नई संभावनाओं को
तलाशते चलें -------------------
स्वार्थ छल का
छद्म आवरण उतारकर
बीती ताहि बिसारकर ...
राह नई विवेक की
बुहारते चलें ----------------
आने वाला वक़्त दूर है
अपना दिन संवारकर
आज का आनंद मनाकर
प्रीत के पुष्प राह में
बिखेरते चलें --------------
-- ज्योत्सना सक्सेना

अमलतासी श्रृंगार

धरती की अलकों ने किया अमलतासी श्रृंगार 
खिल खिल कर रहे गुलमोहर ऊर्जा का संचार 
आमों की मधुरम सुगंध कोयलिया करे पुकार
जलविहीन सरिता रसीले फलों की आई बहार
-- ज्योत्सना सक्सेना

ईश्वर घर दरवेश

बंजारा सा मन बड़ा भटके हर वो देश 
चौरासी योनि भंवर त्यागो अब ये वेश 
लोभ मोह जंजाल के काटो सब कलेश 
परहित धुन चलते चलो ईश्वर घर दरवेश 
-- ज्योत्सना सक्सेना

अंजुरी भर हरसिंगार

पलकों की कोर में..नैनों के छोर में..
अटका हुआ है..पारदर्शी एक बबूला..
अनमोल मोती..सतरंगी एक ख्वाब.
समेटे हूँ...बिखर न जाये कहीं,,,
लुढ़क न जाये कहीं,,रुखसार पे....
स्वप्न सलोना मचल रहा था..
धडकनों में धड़क रहा था...
जागने से डर रही थी..
सैर पर निकल चली थी..
पाक शबनमी बूँद को मै..
मुट्टी में कैद कर चली थी..
नीले श्यामल कृष्ण से आकाश का.
वरण कबका मै कर चली थी..
गोरी राधा सी चांदनी के आँचल को..
अंजुरी भर हरसिंगार से जाने क्यूँ मै भर चली थी.
- ज्योत्सना सक्सेना

साजन ख्वाबों में आ जाते



साजन ख्वाबों में आ जाते
मिलकर सृजन बेल लगाते
आशा का हम दिया जलाकर
स्मृति पुल का फेरा कर आते
कच्ची पक्की मुंडेरों पर 
प्रेम लता परवान चढ़ाते
घूंघट में आँखों की मदिरा
पांव में घुँघरू छनकाते
मधुमय डगर पनघट में हम
घटघट फिर खुशियां छलकाते
-- ज्योत्सना सक्सेना

किसकी आवाज़ का था जादू..

किसकी आवाज़ का था जादू..
शख्सियत की थी मदहोशी..
देह तो देह थी..
रूह को भी न होश रहा..
धड़कता पत्थर मोम हुआ..
शमा मिटी परवाने पर..
मुट्ठी में कैद हुए..चाँद सितारे..
ताजमहल पलकों में..कैद हुआ..
कागज़ कहाँ उड़ चला ..बादलों के संग
तितलियों ने क्यूँ पंख दे डाले...
शिद्दत ए मोहब्बत छिपाई बहुत..
आँखों ने क्यूँ राज़ खोल डाले...
ज़र्द पत्तों को क्यूँ ठिकाना मान बैठे..
महकते बुलबुले को जाने क्यूँ आशियाँ बना बैठे ..
- ज्योत्सना सक्सेना

क्या तेरा और क्या है मेरा ?

सदन आत्मा बना तन तेरा 
आज इधर कल उधर का डेरा 
जन्म मृत्यु प्रभु का है फेरा 
क्या तेरा और क्या है मेरा ?
--- ज्योत्सना सक्सेना

दोहे :--

दोहे :--
मन की सूनी भीत है , मंदिर में मनमीत। 
भटक रहे क्यों दरबदर, तन घट जाये रीत।।
करुणा मन में रख जरा ,जागेगी तब प्रीत ।
हिरदे उजियारा रखो , भीतर है नवनीत ।।
भरम मिटा बन्धन कटा ,जीतेगी तब प्रीत ।
हिय में जब ममता भरे, कण्ठ प्रेम संगीत।।
परहित कुछ कर ले जरा ,क्षण क्षण जाए बीत ।
ध्यान धरो हरि मन भजो ,कर लो भाव विनीत ।।
सहज बनो गाओ भजो ,मानवता के गीत ।
करम भजन सबसे बड़ा ,पावन पुण्य पुनीत ।।
--- ज्योत्सना सक्सेना

बता दे तू मुझे ए ज़िंदगी

नई किरणे चमकती जा रही हैं 
निशा डर से सिमटती जा रही है 
बता दे तू मुझे ए ज़िंदगी 
अकेले क्यों चहकती जा रही हैं
चरागों से हवाएं थक गई हैं 
दिशाएं अब बदलती जा रही हैं
सिला जबसे लबों को जुबां अब
निगाहों में चमकती जा रही है
मिले खुशियां किसी इक अजनबी से
दुआओं में महकती जा रही है
-- --ज्योत्सना सक्सेना

सजनी

गुड़िया छिटकी निंदिया बिसरी चहकी ससुराल चली सजनी
बिजली तड़के बरखा बरसे निभती सबकी सुनती सजनी 
उर में मन मंदिर प्रीत सजे गज़रा बिंदिया सजती सजनी 
हँसती रहती गम पीकर भी धरती सम पीर सहे सजनी
--ज्योत्सना सक्सेना

अज़न्मी कन्या की पुकार


तुम तो देवी स्वरूपा मानकर पूजा करती थीं 
आज अज़न्मी कन्या की हत्यारी कैसे बन रहीं ...
अभी तो इस कली की पाँखुरियाँ खुली भी नहीं 
उसका अस्तित्व मिटाने तुल पड़ी तुम...
वंश के लिए अंश मिटाने का क्रूरतम विचार
कैसे आया माँ ?
तुम तो संस्कार भरती हो,कर्मठता गढ़ती हो
सृजनकर्ता हो .....
तुम कैसे विनाश की ओर अग्रसर हो सकती हो ?
मै जीना चाहती हूँ , माँ ...
तुम्हारी बाँहों के झूले झूलना चाहती हूँ
भय लगता है अल्ट्रा साउंड के कोलाहल से
सुनना चाहती हूँ तुम्हारी सुरीली लोरियां ..
जीने दो मुझे ...माँ
मैं लता मंगेशकर, सानिया मिर्ज़ा सी
बनना चाहती हूँ ...
सुनीता विलियम्स की तरह आसमान छूना चाहती हूँ
कल्पना चावला सी तारों से बात करना चाहती हूँ
मेरा अस्तित्व न मिटाओ माँ...
रोशन करना चाहती हूँ अपना घर
मत करो मेरा जीवन अंधकारमय
तू क्यों डरती है दहेजलोभियों से,माँ..
पढ़ लिखकर ज्ञान का प्रकाश फैलाऊँगी
दहेज़ के दानव से समाज को मुक्त कराऊंगी...
मैं तो राष्ट्र का नवनिर्माण करना चाहती हूँ ...
मेरे नन्हे पैरों को मत रोंदो ..
पी.टी.ऊषा ,अंजू जॉर्ज़ बनकर दौड़ना चाहती हूँ ,माँ..
तेरी सुंदर बेटी बनकर ...
ऐश्वर्या,शिल्पा सा नाम कमाना चाहती हूँ ..
माँ...पापा , दादी को समझाओ
जब वंश धारित्री नहीं होगी
वंश बेल आगे कैसे बढेगी?
माँ... तुम तो शक्ति स्वरूपा हो
फिर क्यों डर गईं समाज से
अभी तो मेरे नन्हे दिल ने ..
धड़कना शुरू ही किया है ...
उसे विराम न दो माँ....
मेरे नाज़ुक कान फट गए हैं ,सुनकर
इन नकाबपोश ,धनलोलुप चिकित्सकों के उपकरणों के क्रंदन से...
मेरी नन्ही नासिका केवल
तुम्हारे बदन की गुलाब सी खुशबू
सूंघना चाहती है माँ.....
बू आती है मुझे लिंग जांच वाले नर्सिंग होम की
माँ...दे दो जीवनदान मुझे ...
मज़बूत बनो माँ...
किरण बेदी बनकर ...
हम तुम ऐसे समाज को सजा दिलाएंगे ..
ऐसे चिकित्सकों को फांसी पर लटकवाएंगे ....
ज्योत्सना सक्सेना ,जयपुर

रश्मिरथी प्रतिबिम्ब

मुग्ध सागर दिल में हुआ प्रेम समर्पण 
अर्ध्य देता रश्मिरथी प्रतिबिम्ब अर्पण
बहती जीवन लहरियों में घोला दम्भ 
तृष्णा माया क्रोध का किया था तर्पण 
---ज्योत्सना सक्सेना

सोमवार, जून 06, 2016

समर्पित भाव

ईश्वर की दृष्टि में भक्त द्वारा भेट की गई वस्तु का मूल्य नही होता...वह तो लोभी है...भाव का..इसलिए भेंट देते समय समर्पित भाव से प्रकृति से प्राप्त वस्तुएं प्रिय हैं प्रभु को...और शबरी सा प्रेमयुक्त भाव...और भेंट के बदले कोई मांग न रखो...वो तो बिन मांगे ही मोती देता है

नवयुग पुकारता


नीला घूंघट नीलाभ उठा दें ---- मौक़ा तो दो
श्लथ बाहों में पुरुषार्थ जगा दें --- मौका तो दो
लहर लहर कर्म दीप जलाकर प्रतीक्षारत नवयुग 
सूरज को बहता निर्झर बना दें --- मौका तो दो
--- ज्योत्सना सक्सेना