शुक्रवार, जून 10, 2016

ठगनी नगरी

अनचीन्ही जीवन राहो में 
मनुज निपट अकेला है ---
जड़ बनता चैतन्य 
चैतन्य पुनः जड़ 
समय चक्र का फेरा है 
तमस तड़ाग में
ज्योतिर्कमल खिलाओ
मुक्ति भोर की बेला है ---
चलो आओ
प्रभाती गाओ
अंतर्मन स्व
छिपी अनुभूति
बनअकिंचन कण
परम रज पाओ
अलौकिक शांति
निर्झरण अंदर है
बाहर कोलाहल झमेला है ---
अनुरागी मन ले चलो
क्षितिज़ परे
मधु यामिनी चख आओ
साक्षी बन चित्त टटोलो
अतृप्त कामना समन्दर
तन नमक का ढेला है ---
सिंचित करो
अग्निशिखा से मन
मिथ्या आबनूसी अहम्
घटायें हटाओ
जीवन कठपुतली का खेला है ---
प्रदीप्त अदृष्ट अगोचर देखो
दुर्लभ यात्रा पर हो आओ
ज़र्द झुर्रियों को
स्वर्णिम हर्फों से
सजा आओ
रिश्तों के जंगल ना भटको
ठगनी नगरी में लेन देन का मेला है --
-- ©ज्योत्सना सक्सेना

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