गुरुवार, जुलाई 24, 2014

कालू का सपना ----


कालू का सपना ----****************

कम उम्र, भारी थैला
किस्मत ने दिया 
कालू को 
कबाड़ चुनने का ठेका
कचरे में मिलते हैं
स्वप्न रंगीले
आज मिला है उसको
ड्राइंग बॉक्स का खोखा
ढूंढ रहा है इसके भीतर
अम्मा की रंगीन चूड़ियाँ
मोर के सुंदर पंख
शंख और सीपियाँ
सजीले सपनों में
देख रहा है , कंधे पर
किताबों से भरा बस्ता ----
लगाकर टाई
लटकाकर
पानी की बोतल
राजा बाबू बनकर
पढ़ने जाऊंगा ---
छन छनाक
सपना टूटा
किरचें चुभने लगी
पंख सा हल्का बैग
हकीकत में भारी हो गया
फिर कबाड़ पर कचरे जैसा
अपने को पाया-------
चला था
पाषाणों पर निशां बनाने
खुशहाली के चित्र सजाने को
अरमानों को पंख कहाँ मिलते हैं
चिथड़े कपड़ों को सिलने
कौन कहाँ कब मिलते हैं----
लौट आया कालू अपनी जमीन पर
चूमकर अपने साथी कुत्तों को
निकल पड़ा
सपनों का थैला टांगकर
अगले कचरे के ढ़ेर पर
फिर एक नए मुकाम पर -----
--- ज्योत्सना सक्सेना

रविवार, जुलाई 13, 2014

प्रिय सखी वृंदा ,
               मै नही जानती इस ख़त को पढने के बाद तुम मुझे अपनी एक प्रिय सखी के रूप में अप्नोगि या नही ? क्योंकि इस समय तुमने अपनी आँखों पर समीर नाम का रंगीन चश्मा चढ़ा रखा है जिससे तुम्हे दुनिया की हर चीज़ रंगीन नज़र आ रही है … तुम्हारी सच्ची सखी के साथ साथ मै तुम्हारी कक्ष सहभागी भी हूँ … कोई भंवरा तुम्हारे भोले मन की कलिका का रसपान ना कर ले … अतः मै इस पत्र के माध्यम से तुम्हे सचेत करना चाहती हूँ … मै अवाक रह गई जब तुमने बताया कि समीर की महीने भर की दोस्ती अब शारीरिक मांग भी करने लगी है … उसके कहे ये शब्द कि'' अब हमारे बीच कोई झीना पर्दा भी नही रहना चाहिए '' जो तुमने ही मुझे बताये थे … तुम तो शायद इन शब्दों की रूमानियत में खोकर आल्हादित हो रहीं थीं … लेकिन मेरा मन उद्वेलित था … लेखनी स्वयं ही कुछ लिखने को उद्धत हो गई
                                      तुम  अप्रतिम सौंदर्य की प्रस्तर प्रतिमा हो जो झीने स्वच्छ पारदर्शी  श्वेत आवरण से आच्छादित होकर लोगों की हृदय सम्राज्ञी बनती है , वन्दनीय बनती है … तुम्हारे भीतर के प्रेम का अलौकिक स्त्रोत पहाड़ की ऊंचाइयों का निर्झरण है जिसकी चंचलता का आनंद प्रकृति ने न्यायिक रूप से सभी के लिए किया है । निश्चित ही प्रकृति ने तुम्हे तुम्हारे आसपास व्याप्त लोगों की निराशा हरने नीलमणि का नीलाभ वितरित करने इस धरती पर भेजा है । तुम बुत नही हो क्योंकि तुम संवेदनशील हो । तुम्हारा व्यक्तित्त्व प्रेम और करुणा का संगम है … तुम्हारे इर्द गिर्द के लोग उम्मीद के चिराग जलाए बैठे हैं … जिनके चिरागों की दीप्ति तुम्हारे संवेगों से ही प्रकाशित होती है । कली के लिए भ्रमरों का आडोलन  प्रकृति की स्वाभाविकता है … तय तो कली को करना है कि उसकी घूंघट की ओट भ्रमर के रसपान के लिए कितनी सीमा निर्धारित करे … अथवा बिलकुल नही ?
                                       मै जानती हूँ अश्रुधारा के प्रतिबिम्ब में तुम अपने अक्स को निहार रही हो । आशा प्रत्याशा के मंजर में अपने को व्यथित पा रही हो । मई तुम्हे खुश देखना चाहती हूँ … लेकिन वो ख़ुशी स्थाई हो … तुम प्रसन्नता के सैलाब से सराबोर रहो … लेकिन वो चरम कहीं और है … तुम्हारी मंजिल और लक्ष्य कहीं और ही हैं …. तुम्हारे भीतर असाधारण ऊर्जा का अनंत भण्डार है … हमारे महाविद्यालय की फ़ुटबाल कप्तान हो तुम … तुमने चुनौतियों और संघर्षों से नाता जोड़ा है … तुम विजयिनी हो … जीती हो … जीतती रहोगी … अपने अंतस को टटोलो … तुम्हारी तलाश क्या है … सही मंजिल पर पहुँचो … ताकि जीवन के संध्याकाळ में भी अपना दैदीप्यमान दमकता चेहरा अपने अन्तःस्थल में पा सको … एक सच्ची मित्रता की यही कामना है । शुभकामनाओ सहित
                                                                                     - तुम्हारी सखी वंदना