सोमवार, फ़रवरी 23, 2015

धुंध

रिश्तों की धुंध पर प्यार का सूरज छाएगा 
भ्रम के कुहासे को पल में निगल जायेगा 
ह्रदय साज पर बज उठेंगे फिर जलतरंग 
मीत सुहानी  सी इक ग़ज़ल गुनगुनाएगा 
-- ज्योत्सना सक्सेना

मंगलवार, फ़रवरी 17, 2015

इक कविता ---

मन की अलमारी के 
कपाट बंद कर 
लगाना चाहती हूँ 
ताला---------------
तेरी खुशबुओं में 
डूबी इबारतें
चाहती हूँ
रखना
गुलों के मानिंद
बंद डायरी की
शक्ल में --------
लगाना चाहती हूँ
पहरा तेरी यादों की
तिज़ोरी पर
पर ये दर्द भरे
सैलाब
तेरी प्रीत के -------
खुशबुओं के रेले
तेरे गीत के-------
तनहा सुरमई सांझों में
तोड़ तटबंध
बह निकलते हैं------
और घुलती उनमे
तेरे खतों की इबारतें 


भूल जाती हूँ
सारे वादे इरादे तेरे----
और ढल जाती
मेरी प्रीत
नए शब्दों की
शक्ल कर इख़्तियार
बन जाती है
इक कविता -------
- ज्योत्सना सक्सेना


मन की अलमारी के 
कपाट बंद कर 
लगाना चाहती हूँ 
ताला---------------
तेरी खुशबुओं में 
डूबी इबारतें
चाहती हूँ
रखना
गुलों के मानिंद
बंद डायरी की
शक्ल में --------
लगाना चाहती हूँ
पहरा तेरी यादों की
तिज़ोरी पर
पर ये दर्द भरे
सैलाब
तेरी प्रीत के -------
खुशबुओं के रेले
तेरे गीत के-------
तनहा सुरमई सांझों में
तोड़ तटबंध
बह निकलते हैं------
और घुलती उनमे
तेरे खतों की इबारतें
भूल जाती हूँ
सारे वादे इरादे तेरे----
और ढल जाती
मेरी प्रीत
नए शब्दों की
शक्ल कर इख़्तियार
बन जाती है
इक कविता -------
- ज्योत्सना सक्सेना

सोमवार, फ़रवरी 16, 2015

चंदा

बहुत दूर फलक पे है , अपनापन समाया है
चंदा तू कुछ भी नही , पर दिल में समाया है
अकेला ये जीवन है , नयनो भरा सावन है
दूर तेरे मुखड़े में , बिम्ब उनका समाया है 
चंदा तू कुछ भी नही , पर दिल में समाया है
चाहत के सितारे हैं , विरह भरे तराने हैं
मन आँगन उतर आओ , भीगा शामियाना हैं
चंदा तू कुछ भी नही , पर दिल में समाया है
गम के घने बादल हैं , आशा भरी बिजली है
अँधेरे में जीने की ,कला को चमकाया है
चंदा तू कुछ भी नही , पर दिल में समाया है
शाम नखराली है रे , दीदारे दिल प्यासा है
बेनूर होकर भी तू , सात रंग से नहाया है
चंदा तू कुछ भी नही , पर दिल में समाया है
बहुत दूर फलक पे है , अपनापन समाया है
चंदा तू कुछ भी नही , पर दिल में समाया है
-- ज्योत्सना सक्सेना

प्रेम का विस्तार हो ...

परियों की चितवन में 
तितली की थिरकन में 
मेहँदी की सुर्खी में 
सूरज के ढलने में 
चाँद के चमकने में
प्रेम का विस्तार हो ----
काजल की गहराई में
भावों की तरुणाई में
स्पंदित लबों में
वादों की शहनाई में
सम्भावना का विस्तार हो ----
केश के गजरे में
कंगन के बजने में
पायल की रुनझुन में
बिंदिया की दमकन में
रोम रोम की पुलकन में
नेह का विस्तार हो --
आस की मुंडेर पे
कागा की टेर पे
शाश्वत अनुभूति में
रूहानी अभिव्यक्ति में
प्रेममय विश्व विस्तार हो --
-- ज्योत्सना सक्सेना

शनिवार, फ़रवरी 07, 2015

ek doha

कर्मों को तू जोड़ ले , जाएँ वही शमशान 
हाथ पसार चला गया , था सिकंदर महान 
-- ज्योत्सना सक्सेना

शुक्रवार, फ़रवरी 06, 2015

सुलगता चाँद

राहे - मोहब्बत ऐसा होता क्यों है
प्रेमी महफ़िल भी , तनहा होता क्यों है
जीने का हुनर सिखाने वालों के पीछे
ये ज़माना खंजर लिए फिरता क्यों है
मौसम खुशगवार बनाने वालों की
दीवानगी में जग कांटे बोता क्यों है
हंसकर जो दर्द के प्याले पी ले, उनपर
बेदर्द ज़माना सितम करता क्यों है
होठों पे अब हंसी ले आओ 'ज्योत्स्ना '
सितम के बाद भी चाँद सुलगता क्यों है
-- ज्योत्सना सक्सेना

ek geet

हंसती  खिलती थी इक कली जैसे मैं
फिरकती थी  तितली सी आँगन में मैं
फूल थी ज़िंदगी ,,,रसरसीली ज़िंदगी
भवरे सा रस को चुरा ले गया है कोई

चंचल थी मैं ,चपला बिजुरी सी मैं
भोली थी मैं ,,सच की पुतली थी मैं
झूठी हूँ  अब ,,, सखियाँ कहती मुझे
मेरे ख्वाबों में पंख लगा गया है कोई
फूल थी ज़िंदगी ,,,रसरसीली ज़िंदगी
भवरे सा रस को चुरा ले गया है कोई

नदिया थी मैं ,,, कलकल गाती थी मैं
अब ना पढाई करूँ ,,,,ना ही काम करूँ
मैं  तन्हाइयों में गीत गुनगुनाती रहूँ
प्यार के बीज दिल पर बो गया है कोई
फूल थी ज़िंदगी ,,,रसरसीली ज़िंदगी
भँवरे  सा रस को चुरा ले गया है कोई

पलकें झुक गईं , रुखसार गुलाबी हुए
अधर लरजने लगे , सांसे चन्दन हुईं
कदम बंसी की धुन पे थिरकने लगे
मुझे मोहन की मीरा बना गया था कोई
फूल थी ज़िंदगी ,,,रसरसीली ज़िंदगी
भवरे सा रस को चुरा ले गया है कोई
                         -- ज्योत्सना सक्सेना


गुरुवार, फ़रवरी 05, 2015

एक दोहा आप सभी मनीषियों के सम्मुख ,,,, 
आपके सुझावों का हृदय से स्वागत ,,,,,,
सृजन के कुछ छोड़ दो , धरती में तुम बीज 
माटी से मिल जायगी , माटी जैसी चीज़ 
-- ज्योत्सना सक्सेना

सोमवार, फ़रवरी 02, 2015

बूंदे हैं मतवाली

बादल को पायल पहना दी 
छम छम बूंदे हैं मतवाली 
धरती ओढ़े चूनर पीली 
फूलों से भर लेती झोली 
बादल को पायल पहना दी 
छम छम बूंदे हैं मतवाली
साजन मेरे आ जाते तो
बाते आज नशीली होतीं
बूंदों संग तुम उतर आते
आँगन में रंगोली होती
बादल को पायल पहना दी
छम छम बूंदे हैं मतवाली
तुम मुझसे रूठे ना होते
सखियों संग ठिठोली होती
चंदा हिय मेरे बस जाता
चांदनी रात अनोखी होती
बादल को पायल पहना दी
छम छम बूंदे हैं मतवाली
होली पर तुम आ ही जाना
चूनर सतरंगी कर जाना
बादल को पायल पहना दी
छम छम बूँदें हैं मतवाली
-- ज्योत्सना सक्सेना