सोमवार, फ़रवरी 16, 2015

प्रेम का विस्तार हो ...

परियों की चितवन में 
तितली की थिरकन में 
मेहँदी की सुर्खी में 
सूरज के ढलने में 
चाँद के चमकने में
प्रेम का विस्तार हो ----
काजल की गहराई में
भावों की तरुणाई में
स्पंदित लबों में
वादों की शहनाई में
सम्भावना का विस्तार हो ----
केश के गजरे में
कंगन के बजने में
पायल की रुनझुन में
बिंदिया की दमकन में
रोम रोम की पुलकन में
नेह का विस्तार हो --
आस की मुंडेर पे
कागा की टेर पे
शाश्वत अनुभूति में
रूहानी अभिव्यक्ति में
प्रेममय विश्व विस्तार हो --
-- ज्योत्सना सक्सेना

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