परियों की चितवन में
तितली की थिरकन में
मेहँदी की सुर्खी में
सूरज के ढलने में
चाँद के चमकने में
प्रेम का विस्तार हो ----
काजल की गहराई में
भावों की तरुणाई में
स्पंदित लबों में
वादों की शहनाई में
सम्भावना का विस्तार हो ----
केश के गजरे में
कंगन के बजने में
पायल की रुनझुन में
बिंदिया की दमकन में
रोम रोम की पुलकन में
नेह का विस्तार हो --
आस की मुंडेर पे
कागा की टेर पे
शाश्वत अनुभूति में
रूहानी अभिव्यक्ति में
प्रेममय विश्व विस्तार हो --
-- ज्योत्सना सक्सेना
तितली की थिरकन में
मेहँदी की सुर्खी में
सूरज के ढलने में
चाँद के चमकने में
प्रेम का विस्तार हो ----
काजल की गहराई में
भावों की तरुणाई में
स्पंदित लबों में
वादों की शहनाई में
सम्भावना का विस्तार हो ----
केश के गजरे में
कंगन के बजने में
पायल की रुनझुन में
बिंदिया की दमकन में
रोम रोम की पुलकन में
नेह का विस्तार हो --
आस की मुंडेर पे
कागा की टेर पे
शाश्वत अनुभूति में
रूहानी अभिव्यक्ति में
प्रेममय विश्व विस्तार हो --
-- ज्योत्सना सक्सेना
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