शुक्रवार, फ़रवरी 06, 2015

ek geet

हंसती  खिलती थी इक कली जैसे मैं
फिरकती थी  तितली सी आँगन में मैं
फूल थी ज़िंदगी ,,,रसरसीली ज़िंदगी
भवरे सा रस को चुरा ले गया है कोई

चंचल थी मैं ,चपला बिजुरी सी मैं
भोली थी मैं ,,सच की पुतली थी मैं
झूठी हूँ  अब ,,, सखियाँ कहती मुझे
मेरे ख्वाबों में पंख लगा गया है कोई
फूल थी ज़िंदगी ,,,रसरसीली ज़िंदगी
भवरे सा रस को चुरा ले गया है कोई

नदिया थी मैं ,,, कलकल गाती थी मैं
अब ना पढाई करूँ ,,,,ना ही काम करूँ
मैं  तन्हाइयों में गीत गुनगुनाती रहूँ
प्यार के बीज दिल पर बो गया है कोई
फूल थी ज़िंदगी ,,,रसरसीली ज़िंदगी
भँवरे  सा रस को चुरा ले गया है कोई

पलकें झुक गईं , रुखसार गुलाबी हुए
अधर लरजने लगे , सांसे चन्दन हुईं
कदम बंसी की धुन पे थिरकने लगे
मुझे मोहन की मीरा बना गया था कोई
फूल थी ज़िंदगी ,,,रसरसीली ज़िंदगी
भवरे सा रस को चुरा ले गया है कोई
                         -- ज्योत्सना सक्सेना


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