शनिवार, जनवरी 31, 2015

सूखे फूल

हरेक मोड़ पर राह पे तेरी अश्कों के मोती बिछाए मैंने
शब भर बेदर्द तेरे लिए चांदनी के फूल बिछाए मैंने
टूट गया भरम कांच सा आज ही जो कल टूटना ही था
जाने क्यूँ सारी सारी रात गेसुओं में गजरे महकाए मैंने
मौजे - रवानी के भंवर में फंस गई कागज़ की कश्ती
सर्द यादों में दर्द भरे नगमें जाने क्यों गुनगुनाये मैंने
हथेली की लकीरों में लिखा ही नही था खुदा ने तेरा नाम
सुर्ख मेहंदी से तेरे नाम क्यूँ अपनी हथेली में रचाए मैंने
नई ताज़गी से फिर से महकेगी मोहब्बत तेरी 'ज्योत्स्ना '
इसी खुशफहमी में कुछ सूखे फूल डायरी में छिपाए मैंने
-- ज्योत्सना सक्सेना

kathputliyan ,,,,

प्रभु की पुतलियों का ना ठौर ना ठिकाना है 
सूनी शाम आँखों का धुंधलापन ही जाना है 
ना मरण है ना ही जन्म अंगड़ाई है जीवन 
चोला बदलकर इस जगत फिर से आना है 
-- ज्योत्सना सक्सेना

सोमवार, जनवरी 26, 2015

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा ,,,

संस्कार सभ्यता संस्कृति का आव्हान है ,,,,, भारत 
वीर शहीदों की गाथा का गौरव गान है ,,,,,,,,भारत 
नीचे हरी भरी धरा तो ऊपर मंगल यान की उड़ान है 
वेदउपनिषद दर्शन योग का संज्ञान है ,,,,,,, भारत 
-- ज्योत्सना सक्सेना

जय हिन्द ,,,, जय भारत ,,,, वन्देमातरम

शनिवार, जनवरी 24, 2015

shubh basantotsava

कुछ चौपाई एक दोहे के साथ ,,,,
नभ लाये भर भर पिचकारी
धरा हुई नभ पर मतवारी
खुशियों भरी बदलियाँ बोली
फूल फूल से भर लो झोली
ओढ़े चूनर धानी धानी
धरा बन गई सुन्दर रानी
कुदरत की रंगत चटकीली
नभ पहने शेरवानी नीली
अवनि करे मिलन की आशा
अम्बर गढ़े प्रेम परिभाषा
सावन सी आँखे भरी ,मधु बरसायें होठ
चाँद सा चेहरा लगे , घूंघट बदली ओट
-- ज्योत्सना सक्सेना

सोमवार, जनवरी 19, 2015

चाँद देखा आज पूरा , 
याद तुम आने लगे 
फूल महके हैं गगन में , 
स्वप्न से छाने लगे 
मधु घुला मधुमास साजन , 
लाज से सिमटी निशा
बोलते तारे ठुमकते ,
छा रहा कैसा नशा
-- ज्योत्सना सक्सेना

शनिवार, जनवरी 03, 2015

दोहे

आज कुछ दोहे आप सभी मनीषियों के सम्मुख
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कैसा निकला ये बरस , बोलूं क्या श्रीमान
धरती की चीखें सुनी , देखा लहूलुहान
एक ओर तो दुःख बड़ा , पीड़ा है घनघोर
घायल है इंसानियत , बच्चों का हैं शोर
देश हमारे रह रहा , मिलजुलकर इंसान
कर्मठता को कर नमन , उड़ाए मंगलयान
इतनी बिनती ज्योति की , सुन लो हे जगदीश
विनीत भाव मांग रही , खड़ी झुकाये शीश
पग धरती छूते रहें , मन गगन का छोर
साहस भरे उठें कदम , नई भोर की ओर
ममता करुणा मन बहे , ऐसा दो वरदान
फूटें रश्मि की किरणें, मिटे तमस की खान
भाईचारा बढ़ सके ,सबको दो सद्ज्ञान
विश्वगुरु बने हमारा , भारत देश महान
-- ज्योत्सना सक्सेना