शनिवार, जनवरी 31, 2015

सूखे फूल

हरेक मोड़ पर राह पे तेरी अश्कों के मोती बिछाए मैंने
शब भर बेदर्द तेरे लिए चांदनी के फूल बिछाए मैंने
टूट गया भरम कांच सा आज ही जो कल टूटना ही था
जाने क्यूँ सारी सारी रात गेसुओं में गजरे महकाए मैंने
मौजे - रवानी के भंवर में फंस गई कागज़ की कश्ती
सर्द यादों में दर्द भरे नगमें जाने क्यों गुनगुनाये मैंने
हथेली की लकीरों में लिखा ही नही था खुदा ने तेरा नाम
सुर्ख मेहंदी से तेरे नाम क्यूँ अपनी हथेली में रचाए मैंने
नई ताज़गी से फिर से महकेगी मोहब्बत तेरी 'ज्योत्स्ना '
इसी खुशफहमी में कुछ सूखे फूल डायरी में छिपाए मैंने
-- ज्योत्सना सक्सेना

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