शनिवार, जनवरी 24, 2015

shubh basantotsava

कुछ चौपाई एक दोहे के साथ ,,,,
नभ लाये भर भर पिचकारी
धरा हुई नभ पर मतवारी
खुशियों भरी बदलियाँ बोली
फूल फूल से भर लो झोली
ओढ़े चूनर धानी धानी
धरा बन गई सुन्दर रानी
कुदरत की रंगत चटकीली
नभ पहने शेरवानी नीली
अवनि करे मिलन की आशा
अम्बर गढ़े प्रेम परिभाषा
सावन सी आँखे भरी ,मधु बरसायें होठ
चाँद सा चेहरा लगे , घूंघट बदली ओट
-- ज्योत्सना सक्सेना

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