गुरुवार, मार्च 26, 2015

याद

कलम घिस दी कागज़ पर , आई तेरी याद 
अक्स झांके तेरा ही , करता है फ़रियाद 
-- ज्योत्सना सक्सेना

मुक्तक

धरा ने थामा आस भरे माथे पे उजियारा 
सुर्ख ओढ़ने से कुदरत ने आस्मां को निखारा
प्रेम मनुहार ने कैदी बनाया रविराज को भी 
झुका गगन खंडखंड पिघला दम्भ काअंधियारा 
-- ज्योत्सना सक्सेना

एक श्रृंगारिक दोहा


बेमौसम बरसात और कृषक की संवेदना ....

बेमौसम बरसात और कृषक की संवेदना 
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तड़कती बिजली 
गरजते बादल 
नयनो में ढलते 
टूटते स्वप्न आस का
टूटा था कांच
बूंदों की किरचें चुभ रहीं
सुलगते खेत देख
रो रहा किसान ---
बहती मिटटी उगल रही
हताशा का संसार
ताश सा थरथराने लगा
उम्मीद भरा महल आलीशान
सुलगते खेत देख
रो रहा किसान ---
दाने दाने सुबक रहे
पूछे अपना मोल
सरसों भटकी राह अपनी
जीरा रोया जार जार
कर्ज ने कतरे पंख
हौसलों के
सुलगते खेत देख
रो रहा किसान ---
कठिन श्रम
ना छुट्टी ना त्यौहार
एक बार फिर जुटना होगा
पुनः कर्मरथ चढ़ना होगा
सूर्य तुम्हे झुकना होगा
तपकर मेरी उम्मीदों पर
एक बार खरा उतरना होगा
आशाओं के दीप जलाता
उठ फिर खड़ा हुआ किसान
-- ज्योत्सना सक्सेना

सूरज गढ़ना जानती हूँ मैं .....

अश्रु सागर में बेचैन लहरे छिपाना जानती हूँ मैं
संघर्ष शूल सृजन पुष्पों में बदलना जानती हूँ मैं
तन्हाइयों में भी गीतों का आगाज़ कर सकती हूँ
शब स्याही निगल नया सूरज गढ़ना जानती हूँ मैं
-- ज्योत्सना सक्सेना

दोहे: घर या मकान

भाव समर्पण हो जहाँ , सुन्दर बने जहान
प्रेम सेतु झूले पड़े , कहते उसे मकान
दिल से मिलते दिल यहाँ ,मिटे शोक अवसाद 
मिले उदासी को यहाँ , मीठा मीठा स्वाद
सद्कर्मों की राह ले , सीखें सद्व्यवहार
संतोष सिखाते बड़े , लक्ष्मी आये द्वार
देह को पहचान मिली , निश्छल बरसे प्यार
जीवन लक्ष्य सफल हुए , स्वप्न होंगे साकार
दिल में दूरी बढ़ गई , ज्यों बड़े हुए मकान
मौन मौन के खेल में , रिश्तों के शमशान
-- ज्योत्सना सक्सेना

muktak

करुणा सम बोध अपार हो 
आत्मिक प्रेम विस्तार हो 
कुदरत मिजाज़ अनुकूल रहे 
खिले उमंगों के कचनार हो 
 -- ज्योत्सना सक्सेना

.इन्द्रधनुषी ख्वाब


कुछ घाटी के इधर 
कुछ पर्वतों के उधर 
इन्द्रधनुष ने बो दिए
आशा के सपनीले रंग
साँसों में महकने लगी
फूलों भरी भीनी सुगंध
बैंगनी सी निंदिया हुई
जामुनी हुए सलोने ख्वाब
अनंत गहराइयों भरा …
नीला आसमान….
हरी हुई वसुंधरा …
फसलों से मालामाल
पीली पीली सरसों चटकी,,,,
अवनि अम्बर का ….
मौन मिलाप ….
नारंगी अरु झूमते पुष्प
पुलकित दुल्हन सी सांझ
देखो जरा भास्कर का हाल
छिटका कर सिन्दूर भर दिया
धरती हुई लाज से लाल ,,,,
- ज्योत्सना सक्सेना

एकलयता में घुलमिल जाएँ ,,,,

आओ ,,, 
घुल मिल जाएँ ------
प्रकृति के संग
कर्मठता के
गान गायें
सूर्य चन्द्रमा
धरा , पहाड़
साधना सेवा की
थिरकन में
घुल मिल जाएँ -----
आनंद ही आनंद
परम चैतन्यकण में
अलौकिक कम्पन्न में
घुलमिल जाएँ------
नृत्यतरंगो संग
नवजीवन के
आशा प्रवाह की
जीवंत निर्झरणी में
घुलमिल जाएँ -------
धरती से आकाश तक
भीतर के नन्हे को जगाकर
प्रभु संग ताल मिला आएं
चलो मुस्कुराएं
दम्भ को भूल जाएँ
मैं को हम बनाकर
एकलयता में
घुलमिल जाएँ -----
-- ज्योत्सना सक्सेना

सोमवार, मार्च 09, 2015

doha '' mahila diwas par''

महिला दिवस पर एक प्रयास ---
दुशासनों की भीड़ में , श्याम को मत पुकार 
काली माँ का रूप धर, कर इनका संहार 
-- ज्योत्सना सक्सेना

कुछ दोहे और ''फाग ''पर ,,, सुधिजनो का मार्गदर्शन अपेक्षित *****************************************************************


बैर भाव सब भूलकर , खूब बजाओ चंग
होली के हुड़दंग में , चढ़े प्रेम की भंग
किंशुक कुसुम में चटके , तरुणाई का रंग
सुर्ख रंग से तन रंगे , मन में बसे उमंग
वृन्दावन में मन बसे , कान्हा का हुड़दंग
राधा पी की बावरी , ठुमके कृष्णा संग
जाम छलकाए मेघ रे , मदिरम फाग समीर
हिरणी सी रास्ता तके , सजनी हुई अधीर
-- ज्योत्सना सक्सेना

सोमवार, मार्च 02, 2015

कुछ दोहे ''फाग ''पर ,,, सुझाव आमंत्रित
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गालों में टेसू खिले , हृदय बज रहे साज
चूनर सीली हो गई , बेसुध नाचूं आज
आलिंगन करती लगे , ये फागुनी बयार
गुनगुन करता अलि करे, छेड़छाड़ सिंगार
भंग चढ़े बिन ही पिए , ऐसा पी का संग
अंग-अंग सावन करे , लगा-लगाकर रंग
पवन हुई मदहोश सी , मँजरी गावे गीत
नीम आम बौराय से , खिली हुई थी प्रीत
छलक छलक मदिरा गिरे , नैनों से चितचोर
सरक सरक चूनर गिरे , मिले न कोई छोर
-- ज्योत्सना सक्सेना