शुक्रवार, दिसंबर 26, 2014

खामोश साँझों को चहकाने आ जाता है रोज़ एक फ़रिश्ता 
ख़्वाबों में मिठास भर जाता है हर रोज़ एक फ़रिश्ता 
सितारों के मन आँगन में आशाओं के सपने बोकर 
उदासियों के बादल समेट ले जाता है रोज एक फ़रिश्ता
-- ज्योत्सना सक्सेना
आओ ,,, 
घुल मिल जाएँ ------
प्रकृति के संग 
कर्मठता के 
गान गायें 
सूर्य चन्द्रमा
धरा , पहाड़
साधना सेवा की
थिरकन में
घुल मिल जाएँ -----
आनंद ही आनंद
परम चैतन्यकण में
अलौकिक कम्पन्न में
घुलमिल जाएँ------
नृत्यतरंगो संग
नवजीवन के
आशा प्रवाह की
जीवंत निर्झरणी में
घुलमिल जाएँ -------
धरती से आकाश तक
भीतर के नन्हे को जगाकर
प्रभु संग ताल मिला आएं
चलो मुस्कुराएं
दम्भ को भूल जाएँ
मैं को हम बनाकर
एकलयता में
घुलमिल जाएँ -----
-- ज्योत्सना सक्सेना
.

गीतिका के छंद सा मन , माथ टीका सज गया 
मोरपंखी भाव सजना , ह्रदय साज बज गया 
प्यार का सन्देश  पाकर , धार काजल बह गया 
नैन दरिया बरस कैसे , चुगलखोरी कर गया 
-- ज्योत्सना सक्सेना 
नरभक्षी पाल रहे , नापाक हैवान तुम
पंथ-पंथ पर वह , तुझको ही खाए हैं
खाए बहलाये रहे, तुझ पे गुर्राय रहे
तुमने ही थपकी दे, हौसले बढ़ाए हैं
हौसले बढ़ाए जब , कहर सहन कर
पत्थरों के सीने कब,कब थर-राए हैं
बच्चों के शवों को देख, यम के पसीने छूटे
दुखी होके खड़े प्रभु , नयन झुकाए हैं ||
                              -- ज्योत्सना सक्सेना 

शनिवार, दिसंबर 20, 2014

मासूमों को मार कर , बड़े बने हैं शूर 
कांप उठी इंसानियत , रोया हर दस्तूर 
भरे हृदय से मासूमों को श्रद्धांजलि 
-- ज्योत्सना सक्सेना
दूर हटे चिंता अहं , दीप बसी हो प्रीत 
बैर भाव सब भूलकर , गले लगो मनमीत
गले लगो मनमीत , दम्भ थोथा गल जाए 
कहे ज्योति यह बात , कंठ कोकिल बन जाए
मधुर बोल संगीत , मिठास का हो दस्तूर 
हिय आँगन हो साफ , हटे चिंता अहम दूर
-- ज्योत्सना सक्सेना
नरभक्षी या हैवान हैं , सांप तुम पाल रहे 
नापाक तेरे पंथ पे ,तुझको ही खाए हैं 
खाए है बहलाये है , तुझ पर गुर्रा रहे 
थपकी दे पीठ पर , हौसले बढ़ाएं हैं 
हौसले जो बढ़ाएं हैं , कहर कैसे ढा रहे 
पत्थर तक रो पड़े , बच्चों को सताए हैं
बच्चों के शव को देख, यम भी घबरा रहे
दुखी होके खड़े प्रभु , नैन झुकाये हैं
-- ज्योत्सना सक्सेना