शुक्रवार, दिसंबर 26, 2014

खामोश साँझों को चहकाने आ जाता है रोज़ एक फ़रिश्ता 
ख़्वाबों में मिठास भर जाता है हर रोज़ एक फ़रिश्ता 
सितारों के मन आँगन में आशाओं के सपने बोकर 
उदासियों के बादल समेट ले जाता है रोज एक फ़रिश्ता
-- ज्योत्सना सक्सेना
आओ ,,, 
घुल मिल जाएँ ------
प्रकृति के संग 
कर्मठता के 
गान गायें 
सूर्य चन्द्रमा
धरा , पहाड़
साधना सेवा की
थिरकन में
घुल मिल जाएँ -----
आनंद ही आनंद
परम चैतन्यकण में
अलौकिक कम्पन्न में
घुलमिल जाएँ------
नृत्यतरंगो संग
नवजीवन के
आशा प्रवाह की
जीवंत निर्झरणी में
घुलमिल जाएँ -------
धरती से आकाश तक
भीतर के नन्हे को जगाकर
प्रभु संग ताल मिला आएं
चलो मुस्कुराएं
दम्भ को भूल जाएँ
मैं को हम बनाकर
एकलयता में
घुलमिल जाएँ -----
-- ज्योत्सना सक्सेना
.

गीतिका के छंद सा मन , माथ टीका सज गया 
मोरपंखी भाव सजना , ह्रदय साज बज गया 
प्यार का सन्देश  पाकर , धार काजल बह गया 
नैन दरिया बरस कैसे , चुगलखोरी कर गया 
-- ज्योत्सना सक्सेना 
नरभक्षी पाल रहे , नापाक हैवान तुम
पंथ-पंथ पर वह , तुझको ही खाए हैं
खाए बहलाये रहे, तुझ पे गुर्राय रहे
तुमने ही थपकी दे, हौसले बढ़ाए हैं
हौसले बढ़ाए जब , कहर सहन कर
पत्थरों के सीने कब,कब थर-राए हैं
बच्चों के शवों को देख, यम के पसीने छूटे
दुखी होके खड़े प्रभु , नयन झुकाए हैं ||
                              -- ज्योत्सना सक्सेना 

शनिवार, दिसंबर 20, 2014

मासूमों को मार कर , बड़े बने हैं शूर 
कांप उठी इंसानियत , रोया हर दस्तूर 
भरे हृदय से मासूमों को श्रद्धांजलि 
-- ज्योत्सना सक्सेना
दूर हटे चिंता अहं , दीप बसी हो प्रीत 
बैर भाव सब भूलकर , गले लगो मनमीत
गले लगो मनमीत , दम्भ थोथा गल जाए 
कहे ज्योति यह बात , कंठ कोकिल बन जाए
मधुर बोल संगीत , मिठास का हो दस्तूर 
हिय आँगन हो साफ , हटे चिंता अहम दूर
-- ज्योत्सना सक्सेना
नरभक्षी या हैवान हैं , सांप तुम पाल रहे 
नापाक तेरे पंथ पे ,तुझको ही खाए हैं 
खाए है बहलाये है , तुझ पर गुर्रा रहे 
थपकी दे पीठ पर , हौसले बढ़ाएं हैं 
हौसले जो बढ़ाएं हैं , कहर कैसे ढा रहे 
पत्थर तक रो पड़े , बच्चों को सताए हैं
बच्चों के शव को देख, यम भी घबरा रहे
दुखी होके खड़े प्रभु , नैन झुकाये हैं
-- ज्योत्सना सक्सेना

मंगलवार, सितंबर 30, 2014

नदिया बोली समंदर से ,,,,

मुक्तछंद की 
ओढ़ चुनरिया 
समंदर से बोली 
इठलाती सी 
नदिया -----
मैं तो आई
तेरे द्वार
मधुभरा
ले टोकरा
प्यास तेरी
बुझा ना पाई
नृत्य करती
मेरी लहरियां ----
छमछम
छमछम
बजा रही थी
अपनी बूंदों की
मैं पायलिया ----
ख़ामोशी मिटाने
चली थीं
मेरी नन्ही सी
अठखेलियां ----
जानने को
उत्सुक हूँ
अजब निराली
तेरी वो दुनिया----
ताप शीत सब
सह चुकी
भटकाव भरी
जग की डगरिया ----
मिटकर भी
पाना चाहती हूँ
सृजन की
नव राग रागनियां ----
साँझ की वेला हुई
नई भोर का आगाज़ है
मुट्ठी में समेट लो
पुकारती तेरी चैतन्यलहरियां
-- ज्योत्सना सक्सेना

बुधवार, सितंबर 24, 2014

आशादीप

दंभ के हिमखंड को 
नेह ताप पिघला देगा 
साध्वी की साधना 
मौन पर्वत चल पड़ेगा 
भावनाओं का ज्वार 
शंख सीप में दफन होगा
बियाबान जंगलों में
देवत्व का रमण होगा
असीम तम के समक्ष
नन्हे आशादीप का नमन होगा
-- ज्योत्सना सक्सेना

तुम्हारे गीत

खामोश निशा में चमकीले पुंजों से पुकारते हैं तुम्हारे गीत 
संवेदनाओं की बर्फ में गुनगुनाते हैं आज भी तुम्हारे गीत 
शाम की तन्हाइयों में कृष्ण की बांसुरी से पुकारते हो क्यों 
एहसासों के चन्दन वन में राधा सी गाती हूँ तुम्हारे गीत 
-- ज्योत्सना सक्सेना

मंगलवार, सितंबर 23, 2014

फिर याद आ गए तुम *********************

फिर याद आ गए तुम 
*********************
तारों के झिलमिलाते आँगन में 
अम्बर के अंतहीन ह्रदय में अंकित 
पूर्णिमा का चाँद देखते ही
एक बार फिर
याद आ गए तुम ----
युगल पंछियों का
नीड़ की ओर बढ़ना
देख धरा की प्यास
श्यामल पावसों का उमड़ना
मुखरित हुआ अनूठा एहसास
प्रतीक्षारत साँझ में
एक बार फिर
याद आ गए तुम ----
चाँद की लरजती खूबसूरती में
मुग्ध तारों का मौन हो जाना
आकाश की स्तब्ध नीरवता में
एक बार फिर
याद आ गए तुम ----
---- ज्योत्सना सक्सेना

शनिवार, सितंबर 20, 2014

ओ !!! मीत

अश्क़ टपाटप गिर रहे , करवट सोई प्रीत। 
रिश्ते पल में रूठ गये ,कैसी जग की रीत।।
दीप प्रेम का जला के ,करो रात को प्रात। 
साँसे पल को थाम के , पूर्ण करो जज्बात।।
मान मनौव्वल हो रहा , भौंरों सा संगीत। 
मधुर मदिर मधुयामिनी ,फूलों जैसी प्रीत।।
दुनियादारी भूल गए , मनमोहन ओ मीत।
लाज हया को भूल के , गाती तेरे गीत।।
-- ज्योत्सना सक्सेना

वियोग की परछाई

खामोश साँझ आई
धरा गगन में समाई
खुशनुमा भ्रम को देख
आँखे फिर भर आईं

नदिया क्यों इठलाई 
समंदर की नींद उड़ाई
वेदना फिर मुखर हुई
मिठास ना भर पाई

शशि ने दौड़ लगाई
रवि से ना मिल पाई
पन्नो में बिखरी थी
अश्कों की रोशनाई

बजी तारों की शहनाई 
आस की लौ जगमगाई
वियोग की छोड़ परछाई
चांदनी छत पे उतर आई
-- ज्योत्सना सक्सेना

मंगलवार, सितंबर 16, 2014

कर्मरथ

प्रभाती मन ज़मीं पे 
जमा हुआ सा 
सर्द शबनमी मोती 
तेरी यादों की आंच में
पिघल गया ------
जाते जाते 
गीत गाते
चन्दा
एक बार फिर
विचारों के
जंगल में
उलझ गया -------
कोरी कोरी
मलमली कुहरे की
चादर में लिपटा
अलसाई आँखों से
झांकता भास्कर
अपने ताम्बई रंग में
खो गया -------
ना चाँद को
भुवन मिला
ना भुवन को चाँद
भोर का तारा
अनायास ऐसा कुछ
कह गया ------
रसधार सा
स्वर्णिम
पिघलता सा दिन
निकल गया -----
निशित मौन
मुखरित पंछियों के
कलरव में
खो गया ------
कर्मरथ पहियों के
शोर में
तनहाइयों का
दर्द
दब गया
--ज्योत्सना सक्सेना

रविवार, सितंबर 07, 2014

समेट लाई.….

सुरमई सांझ के 
वीराने में 
बहती हवा के संग 
चली आई थी 
एक बार फिर 
अनचाहे ही
तुम्हारे
मन द्वार,,,,
सांकल भी
खटखटा
आई थी
तुम्हारे दोनों हाथ
गालों में थे
तुम किसी की
यादों में खोये थे
तुम्हारी सोच
ना छू सकी थी मैं
तुम्हारी कलम
तुम्हारी इबारत के
ऊपर रखी थी
मेरी आँखें
अधूरे शब्द ना
पढ़ सकीं
तुम विचारमग्न थे
तुम्हारे विचारों के
धुंधलके में बनते बिगड़ते
चित्र ना देख पाई
पुरवाई संग गई थी
पछुआ सी चली आई
धीमे से हौले से
कुछ संदली सी
अपनी सी महक
समेट लाई ,,,,
-- ज्योत्सना सक्सेना

शिक्षक दिवस की शुभकामनायें

भारतीय मनीषी गुरुओं को प्रणाम
*********************************
गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ है
गढ़ी गढ़ी काढ़े खोट 
भीतर हाथ सहारिया
बाहर मारे चोट
कबीरदास जी के शब्दों में गुरु एक कुम्हार के सदृश्य है जो शिष्य रुपी कच्चे बर्तन को पीट पीटकर सही आकृति प्रदान करते हैं ,,, बीच बीच में हाथों से संवार कर सार्थक मधुर सम्बन्ध भी स्थापित करते हैं ,,,, आज शिक्षार्थी और शिक्षक के बीच संघर्ष की खाई है ,,, शिक्षार्थी उपभोक्ता और शिक्षक शिक्षा रुपी कारखाने के प्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं ,,,, जहाँ पूर्व में शिक्षक समाज के लिए मूर्त उत्पाद तैयार करता था ,,,,,वहीँ अब शिक्षक केवल पुस्तकीय ज्ञान देकर येन केन प्रकारेण अपने कर्तव्यों की इतिश्री करता है ,,,,और हमारा छात्र वर्ग परिश्रम और समर्पण के स्थान पर विविध तरह के उपाय अपना कर अपना हौसला बुलंद रखते हैं ,,,, शिक्षा के अवमूल्यन का ठीकरा बड़ी सरलता से सरकारी महकमे के शिक्षकों के सर पर फोड़ दिया जाना एक परंपरा सी हो गई है ,,,,कुछ बिन्दुओं पर ध्यान चाहूंगी ,,,, १. जिन बच्चों को निजी विद्यालयों में प्रवेश नही मिलता सरकारी स्कूल के द्वार प्रत्येक बच्चे के लिए खुले होते हैं बिना किसी प्रवेश परीक्षा के ,,,, कितना भी कमजोर बच्चा है ,,,, उसे प्रवेश मिलता ही है ,,,२. सरकारी नीतियों के अनुरूप उसे अनुतीर्ण नही करना है , बारहवीं तक बोर्ड परीक्षा नही है , दसवीं में भी आजकल विकल्प के रूप में है , बोर्ड परीक्षा ,,,३. सत्र पर्यन्त शिक्षकों को छात्रों के अध्यापन के लिए कितना वक़्त मिल पाता है , तरह तरह के दायित्वों का निर्वहन यथा : जनगणना , आर्थिक गणना , पल्स पोलियो ,मिडडे मील में भोजन व्यवस्था , लिपिकीय कार्य आदि आदि ४.बच्चों के साथ खुलकर संवाद हो या डांट फटकार का भय तो जैसे समाप्त ही हो चूका है ,,, मीडिया और राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण बच्चे उच्श्रन्खल हुए हैं ५. आज शिक्षा मूल उद्देश्य से भटक चुकी है ,,, केंद्र बिंदु में बालपन ना होकर '' मुफ्तखोरी '' को प्रोत्साहन दिया जा रहा है , पीड़ा होती है जब अभिभावक बच्चे की प्रगति ना पूछकर कोई नई मुफ्त की योजना जानने को उत्सुक होते हैं ६. शिक्षक कितनी प्रक्रियाओं के गुजर कर एक शिक्षक बनता है ,,, कई बार स्थानांतरण की तकलीफों और रोज़ के अप डाउन की पीड़ा सहता है ,,, तब अपना वेतन प्राप्त करता है ,,,, हाँ इतने बड़े महकमे में हमारे कुछ साथी शिक्षकों ने जरूर अपने कर्तव्यों में कोताही बरती है ,,,, इसका कारण भी हमारे अधिकारियों की भी कार्य के प्रति शिथिलता या यूँ कहें की मुस्तैदी में कमी है,,, तो गलत ना होगा,,,,,
शिक्षक तो प्रकाश पुंज की नींव है ,,, जिनके आचार व्यवहार ,प्रेरक आयाम बच्चों के आदर्श होते हैं ,,,, जीवन में यदि बच्चे को एक अच्छा शिक्षक मिल जाये तो वह बच्चे के जीवन की दिशा ही परिवर्तित कर सकता है ,,,, शिक्षा का स्तर प्रलोभनों से उठाया नही जा सकता बल्कि नए मापदंडों के अनुरूप आधुनिक नवीन पद्धतियों का प्रयोग कर ,,,विद्यालय भवनों में मूलभूत सुविधायें , शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों को संचालित कर पारदर्शी तरीके से उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षकों को पुरुस्कृत करके अभिभावक , शिक्षक और अधिकारियों के मध्य स्वस्थ संवाद कायम करके कुछ हद तक संवारा जा सकता है ,,, नौनिहालों का भविष्य ,,,, मीडिया की सकारात्मक पहल भी इसमें महती भूमिका निभा सकती है ,,,इतना सब होने पर भी शिक्षक को भी आत्माव्लोकन अवश्य करना होगा क्योंकि सच्चा शिक्षक तो वही है जो बच्चे की मन बगिया से बुराइयों की खरपतवार हटाकर अध्ययन के साथ साथ दर्शन चिंतन के भाव बीज रोप सके ,,, सहजता मधुर व्यवहार के पुष्प खिल सके ,,,,, जिनकी सुरभि पूरे विश्व में फ़ैल सके और शिक्षक के रूप में समाज को दमकता व्यक्तित्व हम सौंप सकें ,,,,,
सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन जी को कोटिशः नमन
-- ज्योत्सना सक्सेना
 —

गुरुवार, अगस्त 28, 2014

साईं

भावों का भूखा है साईं 
मंदिर का नही मोहताज 
है भक्तों का दास वो साईं 
श्रद्धा सबूरी जिसका विश्वास 
साईं इन्हें कुछ बुद्धि दे दो 
कर ले बातें आचार व्यवहार की 
कुछ सुविचार और संस्कार की
अर्थ का हो कभी ना अनर्थ
करें बात प्रीत और परमार्थ की
करुणा दया बसे मन में
कडवी बाते क्यूँ स्वार्थ की
धर्म का मूल नही है दंभ
राह छोडो टकराव की
माला फेरना पराया अपना
भूलो थोथी शान
-- ज्योत्सना सक्सेना

साधिका

प्रतिकूलता में अनुकूलता
सरिता की विशेषता
जोड़ना ही जोड़ना
ना तोडना ना छोड़ना
प्यार के संगीत से
लहरों को है बांधना 
सज संवर मचल उठी
वन्दित पुष्प संचेतना
नेह के अभिसार से
मुखरित हुई संवेदना
समर्पणी भाव में
गा उठी अभिव्यंजना
खामोश सा समंदर
मिठास पीता रहेगा और
साधिका को देता रहेगा यंत्रणा ?
-- ज्योत्सना सक्सेना

मंगलवार, अगस्त 05, 2014

फ़रिश्ता

खामोश साँझों को चहकाने आ जाता है रोज़ एक फ़रिश्ता 
ख़्वाबों में मिठास भर जाता है हर रोज़ एक फ़रिश्ता 
सितारों के मन आँगन में आशाओं के सपने बोकर 
उदासियों के बादल समेट ले जाता है रोज एक फ़रिश्ता

-- ज्योत्सना सक्सेना

गुरुवार, जुलाई 24, 2014

कालू का सपना ----


कालू का सपना ----****************

कम उम्र, भारी थैला
किस्मत ने दिया 
कालू को 
कबाड़ चुनने का ठेका
कचरे में मिलते हैं
स्वप्न रंगीले
आज मिला है उसको
ड्राइंग बॉक्स का खोखा
ढूंढ रहा है इसके भीतर
अम्मा की रंगीन चूड़ियाँ
मोर के सुंदर पंख
शंख और सीपियाँ
सजीले सपनों में
देख रहा है , कंधे पर
किताबों से भरा बस्ता ----
लगाकर टाई
लटकाकर
पानी की बोतल
राजा बाबू बनकर
पढ़ने जाऊंगा ---
छन छनाक
सपना टूटा
किरचें चुभने लगी
पंख सा हल्का बैग
हकीकत में भारी हो गया
फिर कबाड़ पर कचरे जैसा
अपने को पाया-------
चला था
पाषाणों पर निशां बनाने
खुशहाली के चित्र सजाने को
अरमानों को पंख कहाँ मिलते हैं
चिथड़े कपड़ों को सिलने
कौन कहाँ कब मिलते हैं----
लौट आया कालू अपनी जमीन पर
चूमकर अपने साथी कुत्तों को
निकल पड़ा
सपनों का थैला टांगकर
अगले कचरे के ढ़ेर पर
फिर एक नए मुकाम पर -----
--- ज्योत्सना सक्सेना

रविवार, जुलाई 13, 2014

प्रिय सखी वृंदा ,
               मै नही जानती इस ख़त को पढने के बाद तुम मुझे अपनी एक प्रिय सखी के रूप में अप्नोगि या नही ? क्योंकि इस समय तुमने अपनी आँखों पर समीर नाम का रंगीन चश्मा चढ़ा रखा है जिससे तुम्हे दुनिया की हर चीज़ रंगीन नज़र आ रही है … तुम्हारी सच्ची सखी के साथ साथ मै तुम्हारी कक्ष सहभागी भी हूँ … कोई भंवरा तुम्हारे भोले मन की कलिका का रसपान ना कर ले … अतः मै इस पत्र के माध्यम से तुम्हे सचेत करना चाहती हूँ … मै अवाक रह गई जब तुमने बताया कि समीर की महीने भर की दोस्ती अब शारीरिक मांग भी करने लगी है … उसके कहे ये शब्द कि'' अब हमारे बीच कोई झीना पर्दा भी नही रहना चाहिए '' जो तुमने ही मुझे बताये थे … तुम तो शायद इन शब्दों की रूमानियत में खोकर आल्हादित हो रहीं थीं … लेकिन मेरा मन उद्वेलित था … लेखनी स्वयं ही कुछ लिखने को उद्धत हो गई
                                      तुम  अप्रतिम सौंदर्य की प्रस्तर प्रतिमा हो जो झीने स्वच्छ पारदर्शी  श्वेत आवरण से आच्छादित होकर लोगों की हृदय सम्राज्ञी बनती है , वन्दनीय बनती है … तुम्हारे भीतर के प्रेम का अलौकिक स्त्रोत पहाड़ की ऊंचाइयों का निर्झरण है जिसकी चंचलता का आनंद प्रकृति ने न्यायिक रूप से सभी के लिए किया है । निश्चित ही प्रकृति ने तुम्हे तुम्हारे आसपास व्याप्त लोगों की निराशा हरने नीलमणि का नीलाभ वितरित करने इस धरती पर भेजा है । तुम बुत नही हो क्योंकि तुम संवेदनशील हो । तुम्हारा व्यक्तित्त्व प्रेम और करुणा का संगम है … तुम्हारे इर्द गिर्द के लोग उम्मीद के चिराग जलाए बैठे हैं … जिनके चिरागों की दीप्ति तुम्हारे संवेगों से ही प्रकाशित होती है । कली के लिए भ्रमरों का आडोलन  प्रकृति की स्वाभाविकता है … तय तो कली को करना है कि उसकी घूंघट की ओट भ्रमर के रसपान के लिए कितनी सीमा निर्धारित करे … अथवा बिलकुल नही ?
                                       मै जानती हूँ अश्रुधारा के प्रतिबिम्ब में तुम अपने अक्स को निहार रही हो । आशा प्रत्याशा के मंजर में अपने को व्यथित पा रही हो । मई तुम्हे खुश देखना चाहती हूँ … लेकिन वो ख़ुशी स्थाई हो … तुम प्रसन्नता के सैलाब से सराबोर रहो … लेकिन वो चरम कहीं और है … तुम्हारी मंजिल और लक्ष्य कहीं और ही हैं …. तुम्हारे भीतर असाधारण ऊर्जा का अनंत भण्डार है … हमारे महाविद्यालय की फ़ुटबाल कप्तान हो तुम … तुमने चुनौतियों और संघर्षों से नाता जोड़ा है … तुम विजयिनी हो … जीती हो … जीतती रहोगी … अपने अंतस को टटोलो … तुम्हारी तलाश क्या है … सही मंजिल पर पहुँचो … ताकि जीवन के संध्याकाळ में भी अपना दैदीप्यमान दमकता चेहरा अपने अन्तःस्थल में पा सको … एक सच्ची मित्रता की यही कामना है । शुभकामनाओ सहित
                                                                                     - तुम्हारी सखी वंदना 

सोमवार, जून 16, 2014

सुरमुई सांझ नारंगी रंग से मोहब्बत की इबारत लिखने लगी 
आसमान के इंद्र दरबार में ख्वाइशों की अप्सराएं सजने लगीं 
सावन के भरे भरे तनहा बादल प्यास ही प्यास बरसाने लगे 
आस भरी रब की नेमत में प्रियतम आज फिर याद आने लगे 
-- ज्योत्सना सक्सेना
श्रमिक ना बनाइये हमारे नौनिहालों को ,,,,
***************************************

विद्यालय बालक के विकास का केंद्र है ,,,, लेकिन आज जब बालक घर से पाठशाला की ओर प्रस्थान करता है तभी से उसके शारीरिक विकास का पतन होना प्रारम्भ हो जाता है ,,,, भारीभरकम बस्ता जो उसके खुद के वज़न से भी कहीं ज्यादा है ,,, लादकर एक श्रमिक की भांति स्कूल के भीतर प्रवेशित होता है ,,,, इस शोचनीय स्थिति में वह किस प्रकार शिक्षा ग्रहण कर पायेगा जब उसके भीतर शारीरिक सामर्थ्य का बल ही नही रह पायेगा ,,,, मान लीजिये प्रारम्भ में ऊर्जा उत्साह के रहते यह हास दृष्टिगोचर ना भी हो ,,, तो क्या भविष्य में वह समाज को अपना सम्पूर्ण योगदान दे पायेगा ? संभवतः नही ,,,,उसका ध्यानकेंद्रण अध्ययन की ओर पर्याप्त नही होगा। उनके शरीर की मांसपेशियां और रीढ़ की हड्डी का आकार और सुदृढ़ता का भविष्य क्या होगा ? विचारणीय है ,,,
वर्तमान शिक्षा का केंद्र बिंदु बालमन नही है अपितु विद्यालय के बड़े बड़े भवन , मोटी मोटी पुस्तकें , ढेर सारे अध्ययन के विषय ,वातानुकूलित कक्ष और महंगे आवागमन के साधनों से है ,,, शिक्षा हमारा ''स्टेटस सिम्बल '' बन गया है। शिक्षा ग्रहण करना एक साधना नही अपितु आडम्बरों का प्रदर्शन करना मानो हो गया है ,,,
बच्चे बड़े नाज़ुक होते हैं ,,,, हरे चने सी कच्ची मुलायम टहनी सी कोमल बाहों में भारी भरकम बस्ता और ककड़ी सी गर्दन में पानी की रंगीन बोतल लटकाकर जब वह टाटा बाई बाई करते बेशक खूबसूरत नज़र आते हैं ,,,, लेकिन हमको उनके भीतर पनपने वाली मानसिक उद्विग्नता का स्वरुप नज़र नही आता ,,, वह कैसे समर्पित हो सकते हैं अध्ययन के प्रति ?
बच्चों को अपने विद्यालय में स्वयं के समुचित विकास का पूरा पूरा अधिकार है ,,,, उस पर बस्ते का बोझ मत लादिये ।
आज जरूरत है शिक्षा के वर्तमान स्वरुप में परिवर्तन की ,,, उस बालक के भीतर की अपार क्षमताओं के दोहन की ,,,, उसके भीतर की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में मार्गनिर्देशित करने की ,,, अन्यथा ये ऊर्जा विनाश की और कदम धरने में देरी नही लगाएगी ,,, जिसकी परिणिति नशा , व्यसन , जुआं , अश्लीलता और आतंकवादी के रूप में सामने आएगी ,,,
"स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का विकास होता है "इस युक्ति को याद रखते हुए ही हमें अपने नौनिहालों को बड़ा करना होगा ,,, स्वछन्दता, आनंद की अनुभूति से भरा मुक्ताकाश सा होना चाहिए हमारे विद्यालयों का प्रांगण ,,, सृजनात्मकता के लिए किसी दबाव की आवश्यकता नही होती ,,, एक बहुत बड़ी बहस की जरूरत है '' शिक्षा बोझा ना होकर आनंददाई बने '' ,,,,, सुधीजनों के विचार आमंत्रित हैं ,,,,
-- ज्योत्सना सक्सेना

शनिवार, मई 10, 2014

नया इतिहास रचेंगे

उम्मीदों की
गीली रेत पर
हसरतों के
गीत लिखेंगे----
संदली संदली
खुशबुओं संग 
मोहब्बत का
व्यापार करेंगे -----
मोहभंवर
कागज़ की कश्ती
चांदनी रात की
सैर करेंगे-----
बंद सीप से
सपनों में
उच्छ्वासों की
प्रीत भरेंगे -----
गोल गोल
शैव पत्थरों का
उछलती लहरों से
अभिषेक करेंगे-----
समंदर की
नमकीनी को
दरियादिल से
दूर करेंगे----
धरा गगन के
श्रृंगारित मिलन पे
नन्हे शंखों से
जयघोष करेंगे-----
ढलती साँझ के
नारंगी रंग से
सौंदर्य भरा
नया इतिहास रचेंगे-----
-- ज्योत्सना सक्सेना

 —

गुरुवार, मार्च 27, 2014

ganit

नदी में फेंके जाने जाने पत्थर  गिना  करते थे ना तुम
मैं उछले हुए पानी में आनंदविभोर हो जाया करती थी
तुम मेरे और तुम्हारे लिखे खतों का हिसाब रखते थे
और मैं खो जाती थी उसकी संदली सी  महक में
तुम्हारी यादों का  योग किया करती हूँ
भीने एहसासों को द्विगुणित करती हूँ
तुम सदा धन का चिन्ह थे मेरे लिए
इसलिए तुमसे घटकर अपने को
शून्य किया करती हूँ
भाग देकर अपने को
गौण  कर लिया
समर्पण के साथ
गणित में कमजोर
थी ना मैं ....
              -- ज्योत्सना सक्सेना 

मंगलवार, फ़रवरी 11, 2014

मुक्ति पथ

सलाइयों के साथ 
एहसासों के गलियारे से 
उलझने सुलझाईं

प्रिय के भावों संग 
सफ़र रंगबिरंगे ख़्वाबों का 
हुई ऊन से बुनाई

फंदा फंदा कह रहा
मिट जाओ , जियो दूसरों के लिए
अहम् को दो बिदाई

संघर्षित जीवन में
अपना निजत्व प्रिय के लिए
सृजन की अमराई

पोर पोर उंगलियां
सलाइयों संग डांडिया रास
राधा सी इतराई

घटते घटते फंदों ने
मानो मुक्ति पथ पर कान्हा संग 

विस्तार बिंदु है पाई

-- ज्योत्सना सक्सेना (२४-१-१४)

तुम ही तुम

दर्पण से आज बेहिसाब बातें की तुम्हारे प्रतिबिम्ब को मुस्काने दीं प्रतीक्षा के इस मधुर क्षणों में सिर्फ तुम ही थे तुम ---
सलाई से आंखों में आंजना काजल भरे सावन मेघों सा गरजना प्रेम की नमी का ठहरना इस पर चाहत का विश्वास चटकती भोर से उम्मीद -----
चाहत के,समर्पण के हर पलों में तुम्ही थे सूरज की लालिमा हंसने की चाह में सिर्फ तुम ही थे मेरे सिर्फ मेरे--
प्रेम का शर्मीलापन ओस की बूंद सा है पारदर्शी तुम्हारे प्रेम के दो बोल कानो में लटकते झुमकों नाक की नथनी माथे की बिंदिया से दमकते हैं प्रतीक हैं तुम्हारे होने का क्योंकि सिर्फ तुम हो मेरे जीवन के पलों में -----
मेरे मन के आइने में केवल तुम थे सिर्फ तुम थे-----
-- ज्योत्सना सक्सेना