सोमवार, जून 16, 2014

श्रमिक ना बनाइये हमारे नौनिहालों को ,,,,
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विद्यालय बालक के विकास का केंद्र है ,,,, लेकिन आज जब बालक घर से पाठशाला की ओर प्रस्थान करता है तभी से उसके शारीरिक विकास का पतन होना प्रारम्भ हो जाता है ,,,, भारीभरकम बस्ता जो उसके खुद के वज़न से भी कहीं ज्यादा है ,,, लादकर एक श्रमिक की भांति स्कूल के भीतर प्रवेशित होता है ,,,, इस शोचनीय स्थिति में वह किस प्रकार शिक्षा ग्रहण कर पायेगा जब उसके भीतर शारीरिक सामर्थ्य का बल ही नही रह पायेगा ,,,, मान लीजिये प्रारम्भ में ऊर्जा उत्साह के रहते यह हास दृष्टिगोचर ना भी हो ,,, तो क्या भविष्य में वह समाज को अपना सम्पूर्ण योगदान दे पायेगा ? संभवतः नही ,,,,उसका ध्यानकेंद्रण अध्ययन की ओर पर्याप्त नही होगा। उनके शरीर की मांसपेशियां और रीढ़ की हड्डी का आकार और सुदृढ़ता का भविष्य क्या होगा ? विचारणीय है ,,,
वर्तमान शिक्षा का केंद्र बिंदु बालमन नही है अपितु विद्यालय के बड़े बड़े भवन , मोटी मोटी पुस्तकें , ढेर सारे अध्ययन के विषय ,वातानुकूलित कक्ष और महंगे आवागमन के साधनों से है ,,, शिक्षा हमारा ''स्टेटस सिम्बल '' बन गया है। शिक्षा ग्रहण करना एक साधना नही अपितु आडम्बरों का प्रदर्शन करना मानो हो गया है ,,,
बच्चे बड़े नाज़ुक होते हैं ,,,, हरे चने सी कच्ची मुलायम टहनी सी कोमल बाहों में भारी भरकम बस्ता और ककड़ी सी गर्दन में पानी की रंगीन बोतल लटकाकर जब वह टाटा बाई बाई करते बेशक खूबसूरत नज़र आते हैं ,,,, लेकिन हमको उनके भीतर पनपने वाली मानसिक उद्विग्नता का स्वरुप नज़र नही आता ,,, वह कैसे समर्पित हो सकते हैं अध्ययन के प्रति ?
बच्चों को अपने विद्यालय में स्वयं के समुचित विकास का पूरा पूरा अधिकार है ,,,, उस पर बस्ते का बोझ मत लादिये ।
आज जरूरत है शिक्षा के वर्तमान स्वरुप में परिवर्तन की ,,, उस बालक के भीतर की अपार क्षमताओं के दोहन की ,,,, उसके भीतर की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा में मार्गनिर्देशित करने की ,,, अन्यथा ये ऊर्जा विनाश की और कदम धरने में देरी नही लगाएगी ,,, जिसकी परिणिति नशा , व्यसन , जुआं , अश्लीलता और आतंकवादी के रूप में सामने आएगी ,,,
"स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क का विकास होता है "इस युक्ति को याद रखते हुए ही हमें अपने नौनिहालों को बड़ा करना होगा ,,, स्वछन्दता, आनंद की अनुभूति से भरा मुक्ताकाश सा होना चाहिए हमारे विद्यालयों का प्रांगण ,,, सृजनात्मकता के लिए किसी दबाव की आवश्यकता नही होती ,,, एक बहुत बड़ी बहस की जरूरत है '' शिक्षा बोझा ना होकर आनंददाई बने '' ,,,,, सुधीजनों के विचार आमंत्रित हैं ,,,,
-- ज्योत्सना सक्सेना

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