गुरुवार, अगस्त 28, 2014

साईं

भावों का भूखा है साईं 
मंदिर का नही मोहताज 
है भक्तों का दास वो साईं 
श्रद्धा सबूरी जिसका विश्वास 
साईं इन्हें कुछ बुद्धि दे दो 
कर ले बातें आचार व्यवहार की 
कुछ सुविचार और संस्कार की
अर्थ का हो कभी ना अनर्थ
करें बात प्रीत और परमार्थ की
करुणा दया बसे मन में
कडवी बाते क्यूँ स्वार्थ की
धर्म का मूल नही है दंभ
राह छोडो टकराव की
माला फेरना पराया अपना
भूलो थोथी शान
-- ज्योत्सना सक्सेना

साधिका

प्रतिकूलता में अनुकूलता
सरिता की विशेषता
जोड़ना ही जोड़ना
ना तोडना ना छोड़ना
प्यार के संगीत से
लहरों को है बांधना 
सज संवर मचल उठी
वन्दित पुष्प संचेतना
नेह के अभिसार से
मुखरित हुई संवेदना
समर्पणी भाव में
गा उठी अभिव्यंजना
खामोश सा समंदर
मिठास पीता रहेगा और
साधिका को देता रहेगा यंत्रणा ?
-- ज्योत्सना सक्सेना

मंगलवार, अगस्त 05, 2014

फ़रिश्ता

खामोश साँझों को चहकाने आ जाता है रोज़ एक फ़रिश्ता 
ख़्वाबों में मिठास भर जाता है हर रोज़ एक फ़रिश्ता 
सितारों के मन आँगन में आशाओं के सपने बोकर 
उदासियों के बादल समेट ले जाता है रोज एक फ़रिश्ता

-- ज्योत्सना सक्सेना