मंगलवार, सितंबर 30, 2014

नदिया बोली समंदर से ,,,,

मुक्तछंद की 
ओढ़ चुनरिया 
समंदर से बोली 
इठलाती सी 
नदिया -----
मैं तो आई
तेरे द्वार
मधुभरा
ले टोकरा
प्यास तेरी
बुझा ना पाई
नृत्य करती
मेरी लहरियां ----
छमछम
छमछम
बजा रही थी
अपनी बूंदों की
मैं पायलिया ----
ख़ामोशी मिटाने
चली थीं
मेरी नन्ही सी
अठखेलियां ----
जानने को
उत्सुक हूँ
अजब निराली
तेरी वो दुनिया----
ताप शीत सब
सह चुकी
भटकाव भरी
जग की डगरिया ----
मिटकर भी
पाना चाहती हूँ
सृजन की
नव राग रागनियां ----
साँझ की वेला हुई
नई भोर का आगाज़ है
मुट्ठी में समेट लो
पुकारती तेरी चैतन्यलहरियां
-- ज्योत्सना सक्सेना

बुधवार, सितंबर 24, 2014

आशादीप

दंभ के हिमखंड को 
नेह ताप पिघला देगा 
साध्वी की साधना 
मौन पर्वत चल पड़ेगा 
भावनाओं का ज्वार 
शंख सीप में दफन होगा
बियाबान जंगलों में
देवत्व का रमण होगा
असीम तम के समक्ष
नन्हे आशादीप का नमन होगा
-- ज्योत्सना सक्सेना

तुम्हारे गीत

खामोश निशा में चमकीले पुंजों से पुकारते हैं तुम्हारे गीत 
संवेदनाओं की बर्फ में गुनगुनाते हैं आज भी तुम्हारे गीत 
शाम की तन्हाइयों में कृष्ण की बांसुरी से पुकारते हो क्यों 
एहसासों के चन्दन वन में राधा सी गाती हूँ तुम्हारे गीत 
-- ज्योत्सना सक्सेना

मंगलवार, सितंबर 23, 2014

फिर याद आ गए तुम *********************

फिर याद आ गए तुम 
*********************
तारों के झिलमिलाते आँगन में 
अम्बर के अंतहीन ह्रदय में अंकित 
पूर्णिमा का चाँद देखते ही
एक बार फिर
याद आ गए तुम ----
युगल पंछियों का
नीड़ की ओर बढ़ना
देख धरा की प्यास
श्यामल पावसों का उमड़ना
मुखरित हुआ अनूठा एहसास
प्रतीक्षारत साँझ में
एक बार फिर
याद आ गए तुम ----
चाँद की लरजती खूबसूरती में
मुग्ध तारों का मौन हो जाना
आकाश की स्तब्ध नीरवता में
एक बार फिर
याद आ गए तुम ----
---- ज्योत्सना सक्सेना

शनिवार, सितंबर 20, 2014

ओ !!! मीत

अश्क़ टपाटप गिर रहे , करवट सोई प्रीत। 
रिश्ते पल में रूठ गये ,कैसी जग की रीत।।
दीप प्रेम का जला के ,करो रात को प्रात। 
साँसे पल को थाम के , पूर्ण करो जज्बात।।
मान मनौव्वल हो रहा , भौंरों सा संगीत। 
मधुर मदिर मधुयामिनी ,फूलों जैसी प्रीत।।
दुनियादारी भूल गए , मनमोहन ओ मीत।
लाज हया को भूल के , गाती तेरे गीत।।
-- ज्योत्सना सक्सेना

वियोग की परछाई

खामोश साँझ आई
धरा गगन में समाई
खुशनुमा भ्रम को देख
आँखे फिर भर आईं

नदिया क्यों इठलाई 
समंदर की नींद उड़ाई
वेदना फिर मुखर हुई
मिठास ना भर पाई

शशि ने दौड़ लगाई
रवि से ना मिल पाई
पन्नो में बिखरी थी
अश्कों की रोशनाई

बजी तारों की शहनाई 
आस की लौ जगमगाई
वियोग की छोड़ परछाई
चांदनी छत पे उतर आई
-- ज्योत्सना सक्सेना

मंगलवार, सितंबर 16, 2014

कर्मरथ

प्रभाती मन ज़मीं पे 
जमा हुआ सा 
सर्द शबनमी मोती 
तेरी यादों की आंच में
पिघल गया ------
जाते जाते 
गीत गाते
चन्दा
एक बार फिर
विचारों के
जंगल में
उलझ गया -------
कोरी कोरी
मलमली कुहरे की
चादर में लिपटा
अलसाई आँखों से
झांकता भास्कर
अपने ताम्बई रंग में
खो गया -------
ना चाँद को
भुवन मिला
ना भुवन को चाँद
भोर का तारा
अनायास ऐसा कुछ
कह गया ------
रसधार सा
स्वर्णिम
पिघलता सा दिन
निकल गया -----
निशित मौन
मुखरित पंछियों के
कलरव में
खो गया ------
कर्मरथ पहियों के
शोर में
तनहाइयों का
दर्द
दब गया
--ज्योत्सना सक्सेना

रविवार, सितंबर 07, 2014

समेट लाई.….

सुरमई सांझ के 
वीराने में 
बहती हवा के संग 
चली आई थी 
एक बार फिर 
अनचाहे ही
तुम्हारे
मन द्वार,,,,
सांकल भी
खटखटा
आई थी
तुम्हारे दोनों हाथ
गालों में थे
तुम किसी की
यादों में खोये थे
तुम्हारी सोच
ना छू सकी थी मैं
तुम्हारी कलम
तुम्हारी इबारत के
ऊपर रखी थी
मेरी आँखें
अधूरे शब्द ना
पढ़ सकीं
तुम विचारमग्न थे
तुम्हारे विचारों के
धुंधलके में बनते बिगड़ते
चित्र ना देख पाई
पुरवाई संग गई थी
पछुआ सी चली आई
धीमे से हौले से
कुछ संदली सी
अपनी सी महक
समेट लाई ,,,,
-- ज्योत्सना सक्सेना

शिक्षक दिवस की शुभकामनायें

भारतीय मनीषी गुरुओं को प्रणाम
*********************************
गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ है
गढ़ी गढ़ी काढ़े खोट 
भीतर हाथ सहारिया
बाहर मारे चोट
कबीरदास जी के शब्दों में गुरु एक कुम्हार के सदृश्य है जो शिष्य रुपी कच्चे बर्तन को पीट पीटकर सही आकृति प्रदान करते हैं ,,, बीच बीच में हाथों से संवार कर सार्थक मधुर सम्बन्ध भी स्थापित करते हैं ,,,, आज शिक्षार्थी और शिक्षक के बीच संघर्ष की खाई है ,,, शिक्षार्थी उपभोक्ता और शिक्षक शिक्षा रुपी कारखाने के प्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं ,,,, जहाँ पूर्व में शिक्षक समाज के लिए मूर्त उत्पाद तैयार करता था ,,,,,वहीँ अब शिक्षक केवल पुस्तकीय ज्ञान देकर येन केन प्रकारेण अपने कर्तव्यों की इतिश्री करता है ,,,,और हमारा छात्र वर्ग परिश्रम और समर्पण के स्थान पर विविध तरह के उपाय अपना कर अपना हौसला बुलंद रखते हैं ,,,, शिक्षा के अवमूल्यन का ठीकरा बड़ी सरलता से सरकारी महकमे के शिक्षकों के सर पर फोड़ दिया जाना एक परंपरा सी हो गई है ,,,,कुछ बिन्दुओं पर ध्यान चाहूंगी ,,,, १. जिन बच्चों को निजी विद्यालयों में प्रवेश नही मिलता सरकारी स्कूल के द्वार प्रत्येक बच्चे के लिए खुले होते हैं बिना किसी प्रवेश परीक्षा के ,,,, कितना भी कमजोर बच्चा है ,,,, उसे प्रवेश मिलता ही है ,,,२. सरकारी नीतियों के अनुरूप उसे अनुतीर्ण नही करना है , बारहवीं तक बोर्ड परीक्षा नही है , दसवीं में भी आजकल विकल्प के रूप में है , बोर्ड परीक्षा ,,,३. सत्र पर्यन्त शिक्षकों को छात्रों के अध्यापन के लिए कितना वक़्त मिल पाता है , तरह तरह के दायित्वों का निर्वहन यथा : जनगणना , आर्थिक गणना , पल्स पोलियो ,मिडडे मील में भोजन व्यवस्था , लिपिकीय कार्य आदि आदि ४.बच्चों के साथ खुलकर संवाद हो या डांट फटकार का भय तो जैसे समाप्त ही हो चूका है ,,, मीडिया और राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण बच्चे उच्श्रन्खल हुए हैं ५. आज शिक्षा मूल उद्देश्य से भटक चुकी है ,,, केंद्र बिंदु में बालपन ना होकर '' मुफ्तखोरी '' को प्रोत्साहन दिया जा रहा है , पीड़ा होती है जब अभिभावक बच्चे की प्रगति ना पूछकर कोई नई मुफ्त की योजना जानने को उत्सुक होते हैं ६. शिक्षक कितनी प्रक्रियाओं के गुजर कर एक शिक्षक बनता है ,,, कई बार स्थानांतरण की तकलीफों और रोज़ के अप डाउन की पीड़ा सहता है ,,, तब अपना वेतन प्राप्त करता है ,,,, हाँ इतने बड़े महकमे में हमारे कुछ साथी शिक्षकों ने जरूर अपने कर्तव्यों में कोताही बरती है ,,,, इसका कारण भी हमारे अधिकारियों की भी कार्य के प्रति शिथिलता या यूँ कहें की मुस्तैदी में कमी है,,, तो गलत ना होगा,,,,,
शिक्षक तो प्रकाश पुंज की नींव है ,,, जिनके आचार व्यवहार ,प्रेरक आयाम बच्चों के आदर्श होते हैं ,,,, जीवन में यदि बच्चे को एक अच्छा शिक्षक मिल जाये तो वह बच्चे के जीवन की दिशा ही परिवर्तित कर सकता है ,,,, शिक्षा का स्तर प्रलोभनों से उठाया नही जा सकता बल्कि नए मापदंडों के अनुरूप आधुनिक नवीन पद्धतियों का प्रयोग कर ,,,विद्यालय भवनों में मूलभूत सुविधायें , शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों को संचालित कर पारदर्शी तरीके से उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षकों को पुरुस्कृत करके अभिभावक , शिक्षक और अधिकारियों के मध्य स्वस्थ संवाद कायम करके कुछ हद तक संवारा जा सकता है ,,, नौनिहालों का भविष्य ,,,, मीडिया की सकारात्मक पहल भी इसमें महती भूमिका निभा सकती है ,,,इतना सब होने पर भी शिक्षक को भी आत्माव्लोकन अवश्य करना होगा क्योंकि सच्चा शिक्षक तो वही है जो बच्चे की मन बगिया से बुराइयों की खरपतवार हटाकर अध्ययन के साथ साथ दर्शन चिंतन के भाव बीज रोप सके ,,, सहजता मधुर व्यवहार के पुष्प खिल सके ,,,,, जिनकी सुरभि पूरे विश्व में फ़ैल सके और शिक्षक के रूप में समाज को दमकता व्यक्तित्व हम सौंप सकें ,,,,,
सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन जी को कोटिशः नमन
-- ज्योत्सना सक्सेना
 —