मंगलवार, सितंबर 16, 2014

कर्मरथ

प्रभाती मन ज़मीं पे 
जमा हुआ सा 
सर्द शबनमी मोती 
तेरी यादों की आंच में
पिघल गया ------
जाते जाते 
गीत गाते
चन्दा
एक बार फिर
विचारों के
जंगल में
उलझ गया -------
कोरी कोरी
मलमली कुहरे की
चादर में लिपटा
अलसाई आँखों से
झांकता भास्कर
अपने ताम्बई रंग में
खो गया -------
ना चाँद को
भुवन मिला
ना भुवन को चाँद
भोर का तारा
अनायास ऐसा कुछ
कह गया ------
रसधार सा
स्वर्णिम
पिघलता सा दिन
निकल गया -----
निशित मौन
मुखरित पंछियों के
कलरव में
खो गया ------
कर्मरथ पहियों के
शोर में
तनहाइयों का
दर्द
दब गया
--ज्योत्सना सक्सेना

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