रविवार, सितंबर 07, 2014

शिक्षक दिवस की शुभकामनायें

भारतीय मनीषी गुरुओं को प्रणाम
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गुरु कुम्हार शिष्य कुम्भ है
गढ़ी गढ़ी काढ़े खोट 
भीतर हाथ सहारिया
बाहर मारे चोट
कबीरदास जी के शब्दों में गुरु एक कुम्हार के सदृश्य है जो शिष्य रुपी कच्चे बर्तन को पीट पीटकर सही आकृति प्रदान करते हैं ,,, बीच बीच में हाथों से संवार कर सार्थक मधुर सम्बन्ध भी स्थापित करते हैं ,,,, आज शिक्षार्थी और शिक्षक के बीच संघर्ष की खाई है ,,, शिक्षार्थी उपभोक्ता और शिक्षक शिक्षा रुपी कारखाने के प्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं ,,,, जहाँ पूर्व में शिक्षक समाज के लिए मूर्त उत्पाद तैयार करता था ,,,,,वहीँ अब शिक्षक केवल पुस्तकीय ज्ञान देकर येन केन प्रकारेण अपने कर्तव्यों की इतिश्री करता है ,,,,और हमारा छात्र वर्ग परिश्रम और समर्पण के स्थान पर विविध तरह के उपाय अपना कर अपना हौसला बुलंद रखते हैं ,,,, शिक्षा के अवमूल्यन का ठीकरा बड़ी सरलता से सरकारी महकमे के शिक्षकों के सर पर फोड़ दिया जाना एक परंपरा सी हो गई है ,,,,कुछ बिन्दुओं पर ध्यान चाहूंगी ,,,, १. जिन बच्चों को निजी विद्यालयों में प्रवेश नही मिलता सरकारी स्कूल के द्वार प्रत्येक बच्चे के लिए खुले होते हैं बिना किसी प्रवेश परीक्षा के ,,,, कितना भी कमजोर बच्चा है ,,,, उसे प्रवेश मिलता ही है ,,,२. सरकारी नीतियों के अनुरूप उसे अनुतीर्ण नही करना है , बारहवीं तक बोर्ड परीक्षा नही है , दसवीं में भी आजकल विकल्प के रूप में है , बोर्ड परीक्षा ,,,३. सत्र पर्यन्त शिक्षकों को छात्रों के अध्यापन के लिए कितना वक़्त मिल पाता है , तरह तरह के दायित्वों का निर्वहन यथा : जनगणना , आर्थिक गणना , पल्स पोलियो ,मिडडे मील में भोजन व्यवस्था , लिपिकीय कार्य आदि आदि ४.बच्चों के साथ खुलकर संवाद हो या डांट फटकार का भय तो जैसे समाप्त ही हो चूका है ,,, मीडिया और राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण बच्चे उच्श्रन्खल हुए हैं ५. आज शिक्षा मूल उद्देश्य से भटक चुकी है ,,, केंद्र बिंदु में बालपन ना होकर '' मुफ्तखोरी '' को प्रोत्साहन दिया जा रहा है , पीड़ा होती है जब अभिभावक बच्चे की प्रगति ना पूछकर कोई नई मुफ्त की योजना जानने को उत्सुक होते हैं ६. शिक्षक कितनी प्रक्रियाओं के गुजर कर एक शिक्षक बनता है ,,, कई बार स्थानांतरण की तकलीफों और रोज़ के अप डाउन की पीड़ा सहता है ,,, तब अपना वेतन प्राप्त करता है ,,,, हाँ इतने बड़े महकमे में हमारे कुछ साथी शिक्षकों ने जरूर अपने कर्तव्यों में कोताही बरती है ,,,, इसका कारण भी हमारे अधिकारियों की भी कार्य के प्रति शिथिलता या यूँ कहें की मुस्तैदी में कमी है,,, तो गलत ना होगा,,,,,
शिक्षक तो प्रकाश पुंज की नींव है ,,, जिनके आचार व्यवहार ,प्रेरक आयाम बच्चों के आदर्श होते हैं ,,,, जीवन में यदि बच्चे को एक अच्छा शिक्षक मिल जाये तो वह बच्चे के जीवन की दिशा ही परिवर्तित कर सकता है ,,,, शिक्षा का स्तर प्रलोभनों से उठाया नही जा सकता बल्कि नए मापदंडों के अनुरूप आधुनिक नवीन पद्धतियों का प्रयोग कर ,,,विद्यालय भवनों में मूलभूत सुविधायें , शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रमों को संचालित कर पारदर्शी तरीके से उत्कृष्ट कार्य करने वाले शिक्षकों को पुरुस्कृत करके अभिभावक , शिक्षक और अधिकारियों के मध्य स्वस्थ संवाद कायम करके कुछ हद तक संवारा जा सकता है ,,, नौनिहालों का भविष्य ,,,, मीडिया की सकारात्मक पहल भी इसमें महती भूमिका निभा सकती है ,,,इतना सब होने पर भी शिक्षक को भी आत्माव्लोकन अवश्य करना होगा क्योंकि सच्चा शिक्षक तो वही है जो बच्चे की मन बगिया से बुराइयों की खरपतवार हटाकर अध्ययन के साथ साथ दर्शन चिंतन के भाव बीज रोप सके ,,, सहजता मधुर व्यवहार के पुष्प खिल सके ,,,,, जिनकी सुरभि पूरे विश्व में फ़ैल सके और शिक्षक के रूप में समाज को दमकता व्यक्तित्व हम सौंप सकें ,,,,,
सर्वपल्ली डॉ राधाकृष्णन जी को कोटिशः नमन
-- ज्योत्सना सक्सेना
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