शनिवार, सितंबर 20, 2014

वियोग की परछाई

खामोश साँझ आई
धरा गगन में समाई
खुशनुमा भ्रम को देख
आँखे फिर भर आईं

नदिया क्यों इठलाई 
समंदर की नींद उड़ाई
वेदना फिर मुखर हुई
मिठास ना भर पाई

शशि ने दौड़ लगाई
रवि से ना मिल पाई
पन्नो में बिखरी थी
अश्कों की रोशनाई

बजी तारों की शहनाई 
आस की लौ जगमगाई
वियोग की छोड़ परछाई
चांदनी छत पे उतर आई
-- ज्योत्सना सक्सेना

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