खामोश साँझ आई
धरा गगन में समाई
खुशनुमा भ्रम को देख
आँखे फिर भर आईं
नदिया क्यों इठलाई
समंदर की नींद उड़ाई
वेदना फिर मुखर हुई
मिठास ना भर पाई
शशि ने दौड़ लगाई
रवि से ना मिल पाई
पन्नो में बिखरी थी
अश्कों की रोशनाई
बजी तारों की शहनाई
धरा गगन में समाई
खुशनुमा भ्रम को देख
आँखे फिर भर आईं
नदिया क्यों इठलाई
समंदर की नींद उड़ाई
वेदना फिर मुखर हुई
मिठास ना भर पाई
शशि ने दौड़ लगाई
रवि से ना मिल पाई
पन्नो में बिखरी थी
अश्कों की रोशनाई
बजी तारों की शहनाई
आस की लौ जगमगाई
वियोग की छोड़ परछाई
चांदनी छत पे उतर आई
-- ज्योत्सना सक्सेना
वियोग की छोड़ परछाई
चांदनी छत पे उतर आई
-- ज्योत्सना सक्सेना
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