रविवार, सितंबर 07, 2014

समेट लाई.….

सुरमई सांझ के 
वीराने में 
बहती हवा के संग 
चली आई थी 
एक बार फिर 
अनचाहे ही
तुम्हारे
मन द्वार,,,,
सांकल भी
खटखटा
आई थी
तुम्हारे दोनों हाथ
गालों में थे
तुम किसी की
यादों में खोये थे
तुम्हारी सोच
ना छू सकी थी मैं
तुम्हारी कलम
तुम्हारी इबारत के
ऊपर रखी थी
मेरी आँखें
अधूरे शब्द ना
पढ़ सकीं
तुम विचारमग्न थे
तुम्हारे विचारों के
धुंधलके में बनते बिगड़ते
चित्र ना देख पाई
पुरवाई संग गई थी
पछुआ सी चली आई
धीमे से हौले से
कुछ संदली सी
अपनी सी महक
समेट लाई ,,,,
-- ज्योत्सना सक्सेना

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