मंगलवार, सितंबर 30, 2014

नदिया बोली समंदर से ,,,,

मुक्तछंद की 
ओढ़ चुनरिया 
समंदर से बोली 
इठलाती सी 
नदिया -----
मैं तो आई
तेरे द्वार
मधुभरा
ले टोकरा
प्यास तेरी
बुझा ना पाई
नृत्य करती
मेरी लहरियां ----
छमछम
छमछम
बजा रही थी
अपनी बूंदों की
मैं पायलिया ----
ख़ामोशी मिटाने
चली थीं
मेरी नन्ही सी
अठखेलियां ----
जानने को
उत्सुक हूँ
अजब निराली
तेरी वो दुनिया----
ताप शीत सब
सह चुकी
भटकाव भरी
जग की डगरिया ----
मिटकर भी
पाना चाहती हूँ
सृजन की
नव राग रागनियां ----
साँझ की वेला हुई
नई भोर का आगाज़ है
मुट्ठी में समेट लो
पुकारती तेरी चैतन्यलहरियां
-- ज्योत्सना सक्सेना

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