मुक्तछंद की
ओढ़ चुनरिया
समंदर से बोली
इठलाती सी
नदिया -----
मैं तो आई
तेरे द्वार
मधुभरा
ले टोकरा
प्यास तेरी
बुझा ना पाई
नृत्य करती
मेरी लहरियां ----
छमछम
छमछम
बजा रही थी
अपनी बूंदों की
मैं पायलिया ----
ख़ामोशी मिटाने
चली थीं
मेरी नन्ही सी
अठखेलियां ----
जानने को
उत्सुक हूँ
अजब निराली
तेरी वो दुनिया----
ताप शीत सब
सह चुकी
भटकाव भरी
जग की डगरिया ----
मिटकर भी
पाना चाहती हूँ
सृजन की
नव राग रागनियां ----
साँझ की वेला हुई
नई भोर का आगाज़ है
मुट्ठी में समेट लो
पुकारती तेरी चैतन्यलहरियां
-- ज्योत्सना सक्सेना
ओढ़ चुनरिया
समंदर से बोली
इठलाती सी
नदिया -----
मैं तो आई
तेरे द्वार
मधुभरा
ले टोकरा
प्यास तेरी
बुझा ना पाई
नृत्य करती
मेरी लहरियां ----
छमछम
छमछम
बजा रही थी
अपनी बूंदों की
मैं पायलिया ----
ख़ामोशी मिटाने
चली थीं
मेरी नन्ही सी
अठखेलियां ----
जानने को
उत्सुक हूँ
अजब निराली
तेरी वो दुनिया----
ताप शीत सब
सह चुकी
भटकाव भरी
जग की डगरिया ----
मिटकर भी
पाना चाहती हूँ
सृजन की
नव राग रागनियां ----
साँझ की वेला हुई
नई भोर का आगाज़ है
मुट्ठी में समेट लो
पुकारती तेरी चैतन्यलहरियां
-- ज्योत्सना सक्सेना
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें