धरा ने थामा आस भरे माथे पे उजियारा
सुर्ख ओढ़ने से कुदरत ने आस्मां को निखारा
प्रेम मनुहार ने कैदी बनाया रविराज को भी
झुका गगन खंडखंड पिघला दम्भ काअंधियारा
-- ज्योत्सना सक्सेना
सुर्ख ओढ़ने से कुदरत ने आस्मां को निखारा
प्रेम मनुहार ने कैदी बनाया रविराज को भी
झुका गगन खंडखंड पिघला दम्भ काअंधियारा
-- ज्योत्सना सक्सेना
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें