गुरुवार, मार्च 26, 2015

एकलयता में घुलमिल जाएँ ,,,,

आओ ,,, 
घुल मिल जाएँ ------
प्रकृति के संग
कर्मठता के
गान गायें
सूर्य चन्द्रमा
धरा , पहाड़
साधना सेवा की
थिरकन में
घुल मिल जाएँ -----
आनंद ही आनंद
परम चैतन्यकण में
अलौकिक कम्पन्न में
घुलमिल जाएँ------
नृत्यतरंगो संग
नवजीवन के
आशा प्रवाह की
जीवंत निर्झरणी में
घुलमिल जाएँ -------
धरती से आकाश तक
भीतर के नन्हे को जगाकर
प्रभु संग ताल मिला आएं
चलो मुस्कुराएं
दम्भ को भूल जाएँ
मैं को हम बनाकर
एकलयता में
घुलमिल जाएँ -----
-- ज्योत्सना सक्सेना

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