मंगलवार, फ़रवरी 17, 2015

इक कविता ---

मन की अलमारी के 
कपाट बंद कर 
लगाना चाहती हूँ 
ताला---------------
तेरी खुशबुओं में 
डूबी इबारतें
चाहती हूँ
रखना
गुलों के मानिंद
बंद डायरी की
शक्ल में --------
लगाना चाहती हूँ
पहरा तेरी यादों की
तिज़ोरी पर
पर ये दर्द भरे
सैलाब
तेरी प्रीत के -------
खुशबुओं के रेले
तेरे गीत के-------
तनहा सुरमई सांझों में
तोड़ तटबंध
बह निकलते हैं------
और घुलती उनमे
तेरे खतों की इबारतें 


भूल जाती हूँ
सारे वादे इरादे तेरे----
और ढल जाती
मेरी प्रीत
नए शब्दों की
शक्ल कर इख़्तियार
बन जाती है
इक कविता -------
- ज्योत्सना सक्सेना


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