किसकी आवाज़ का था जादू..
शख्सियत की थी मदहोशी..
देह तो देह थी..
रूह को भी न होश रहा..
धड़कता पत्थर मोम हुआ..
शमा मिटी परवाने पर..
मुट्ठी में कैद हुए..चाँद सितारे..
ताजमहल पलकों में..कैद हुआ..
कागज़ कहाँ उड़ चला ..बादलों के संग
तितलियों ने क्यूँ पंख दे डाले...
शिद्दत ए मोहब्बत छिपाई बहुत..
आँखों ने क्यूँ राज़ खोल डाले...
ज़र्द पत्तों को क्यूँ ठिकाना मान बैठे..
महकते बुलबुले को जाने क्यूँ आशियाँ बना बैठे ..
- ज्योत्सना सक्सेना
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