शुक्रवार, जून 10, 2016
अज़न्मी कन्या की पुकार
तुम तो देवी स्वरूपा मानकर पूजा करती थीं
आज अज़न्मी कन्या की हत्यारी कैसे बन रहीं ...
अभी तो इस कली की पाँखुरियाँ खुली भी नहीं
उसका अस्तित्व मिटाने तुल पड़ी तुम...
वंश के लिए अंश मिटाने का क्रूरतम विचार
कैसे आया माँ ?
तुम तो संस्कार भरती हो,कर्मठता गढ़ती हो
सृजनकर्ता हो .....
तुम कैसे विनाश की ओर अग्रसर हो सकती हो ?
मै जीना चाहती हूँ , माँ ...
तुम्हारी बाँहों के झूले झूलना चाहती हूँ
भय लगता है अल्ट्रा साउंड के कोलाहल से
सुनना चाहती हूँ तुम्हारी सुरीली लोरियां ..
जीने दो मुझे ...माँ
मैं लता मंगेशकर, सानिया मिर्ज़ा सी
बनना चाहती हूँ ...
सुनीता विलियम्स की तरह आसमान छूना चाहती हूँ
कल्पना चावला सी तारों से बात करना चाहती हूँ
मेरा अस्तित्व न मिटाओ माँ...
रोशन करना चाहती हूँ अपना घर
मत करो मेरा जीवन अंधकारमय
तू क्यों डरती है दहेजलोभियों से,माँ..
पढ़ लिखकर ज्ञान का प्रकाश फैलाऊँगी
दहेज़ के दानव से समाज को मुक्त कराऊंगी...
मैं तो राष्ट्र का नवनिर्माण करना चाहती हूँ ...
मेरे नन्हे पैरों को मत रोंदो ..
पी.टी.ऊषा ,अंजू जॉर्ज़ बनकर दौड़ना चाहती हूँ ,माँ..
तेरी सुंदर बेटी बनकर ...
ऐश्वर्या,शिल्पा सा नाम कमाना चाहती हूँ ..
माँ...पापा , दादी को समझाओ
जब वंश धारित्री नहीं होगी
वंश बेल आगे कैसे बढेगी?
माँ... तुम तो शक्ति स्वरूपा हो
फिर क्यों डर गईं समाज से
अभी तो मेरे नन्हे दिल ने ..
धड़कना शुरू ही किया है ...
उसे विराम न दो माँ....
मेरे नाज़ुक कान फट गए हैं ,सुनकर
इन नकाबपोश ,धनलोलुप चिकित्सकों के उपकरणों के क्रंदन से...
मेरी नन्ही नासिका केवल
तुम्हारे बदन की गुलाब सी खुशबू
सूंघना चाहती है माँ.....
बू आती है मुझे लिंग जांच वाले नर्सिंग होम की
माँ...दे दो जीवनदान मुझे ...
मज़बूत बनो माँ...
किरण बेदी बनकर ...
हम तुम ऐसे समाज को सजा दिलाएंगे ..
ऐसे चिकित्सकों को फांसी पर लटकवाएंगे ....
ज्योत्सना सक्सेना ,जयपुर
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