शुक्रवार, जून 10, 2016

शून्य में लापता हो गये हैं हम

शून्य में लापता हो गये हैं हम
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नदी में फेंकते थे जब
मेरे नाम का कंकड़
पानी की हिलोरों के संग 
डूब जाया करती थी मैं
बहुत गहरे तक
तुम्हारे साथ----
मेरे लिखे खतों को
सहेजकर रखते समय
कहते थे
मलय सी महकती हो
शब्दों से निकलकर----
मैं तुम्हारे अहसासों की जमीन पर
ध्यान मुद्रा में बैठकर
करती हूँ
प्रेम का जोड़-घटाना
यादों का गुणा- भाग
सच तो यह है कि
यथार्थ के धरातल पर
शून्य में लापता हो गयेंये हैं हम--
ज्योत्सना सक्सेना
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