मंगलवार, जून 14, 2016

घुँघरू तितलियाँ के ,,,,

तितलियाँ बाँध के घुँघरू ,निराली बन ठुमकती है 
बदलियाँ जाम से भारी , निगाहों पे छलकती हैं 
चली है तोड़ के बंधन , नदी सागर से मिलने को 
ढली हो शिल्प में जैसे ,बिना ठहरे ही चलती है 
घटायें चूमती पर्वत , हवा भी बावरी ग़ाफ़िल 
घने जंगल में जुगनू थे , दिवाली खूब हंसती है
किताबों में छिपे ख़त थे ,गुलाबों रंग छाये थे
सलामत पुल था यादों का ,लहर धड़कन मचलती है
हिना में नाम था उसका ,छिपा साजन सलोना सा
चुराए रंग कुदरत ने , दुआओं में महकती है
मंजीरे से लगे पत्ते , लबों में घुल गया शरबत
उदासी हो गई पतझड़ , बहारें मन चहकती हैं
--- ज्योत्सना सक्सेना

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