शनिवार, जून 04, 2016

शिव ,कृष्ण , हनुमान ,इंद्र आदि नामों मेरी कोई आस्था नहीं है ,,,, ना मैं उन्हें मन से पूजना चाहती हूँ
हाँ जल , अवनि ,आकाश , वृक्ष ,,,चाँद तारों को ध्याती हूँ पूरे मनोयोग से ,,, धन्यवाद देती हूँ ,,, और इनमे ही पाती हूँ शिव कृष्ण हनुमान और भी देवी देवताओं का अक्स ,,,, स्वयं का चित्र ,,,, श्रद्धा भाव से मस्तक झुकाती हूँ ,,,, नदी की लहरों से जब भी पाँव टकराते हैं ,,,, भीतर से भजन स्वतः गुंजायमान होने लगते हैं ,,, संगीतलहरियां आल्हादित होती हैं ,,,, सृजन प्रस्फुटित होता है ,,,, पहाड़ों से टकराता है मौन मेरा ,,,, प्रतिध्वनित होता है संगीत ,,,, वृक्ष मेरे अभिमान की कार्बनडाई ऑक्साइड लीलने लगते हैं ,,, माटी मेरे सद्कर्मों को आशीर्वादित करती है ,,,, साँसे घुलने लगती हैं परम के अंश में ,,,, भावविभोर होकर प्रकृतितंत्र में पूर्णरूपेण आरूढ़ हो जाती हूँ ,,, उस नैसर्गिकता में खोजती हूँ ईश ,,,, झरने लगता है अविरल प्रेम बूँद बूँद ,,,, आस्वादन मिलता है उसके चरणामृत का ,,,, क्या ये श्रद्धा नहीं ,,,, परम के प्रति अनुराग नहीं ,,,, भक्ति नहीं ,,,जोर जोर शंख , नगाड़े और घण्टे बजाकर या पंडितों को जिमाकर ढेर सारी दक्षिणा देकर ,,, भागवत कथा सुनकर ,,,, ही ईश्वर के करीब जाया जा सकता है ,,,,,अपने पूरे जीवन में भी अगर हम एक अनाथ बच्चे की समस्त जिम्मेदारी उठा लें ,,,, तो उसकी किलकारी में अवश्य हम बुद्ध को अपने समीप पाएंगे ,,,,किसी गरीब शिशु को आइसक्रीम देकर तो देखिये ,,,, कितना सुकून होगा आपको ,,, उसके चेहरे की संतुष्टि देखकर ,,, कभी करिये तो सही अपना दम्भ तोड़कर ,,,

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