शुक्रवार, जून 10, 2016

नमन परम को

हौले से चली आई 
मद्धिम शाम सूनी सी 
थरथराती लौ भभकी थी 
पवन रुख थी बदलती सी 
चलो आओ चले हम 
कुछ नए दीप जलाते हैं
दिशा हम भी बदल लेवें
पवन थमती नही देखो
स्मृति आँगन में झर गए
हरसिंगार चुनते हैं
प्रगति क्षितिज पे आरूढ़
ध्रुव तारे को चुनते हैं
उत्कंठित मौन पुकारे है
नवल सोपान रचते हैं
सडक का रोकता जलभ्रम
धवल शतदल खिलाते हैं
श्रम के स्वेद बिंदु से
नमन परम को करते हैं ,,,,,
-- ज्योत्सना सक्सेना 

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