शनिवार, जून 04, 2016

सदा रहती सफ़र में हूँ

सदा रहती सफ़र में हूँ,ख़ुदा को मैं निहारूँ रे
खिलेगा राह में उपवन, पथों को मैं बुहारूँ रे
दया दे दे मुझे तू अब ,चमकता साँझ का तारा
भजूँ मैं नाम बस तेरा ,विचारों को संवारु रे
मिटा दे द्वैत भावों को ,मिला ले दूध पानी सा
परम तेरा ही कण हूँ मैं ,गुणों को मैं सहारूँ रे
बसा दो प्रेम की नगरी ,मिटाओ त्रास चौरासी
बजा दो धुन मुरलिया की ,हरी को ही पुकारूँ रे
भजूँ मैं नाम तेरा ही, बनूँ मैं राधिका जैसी
किनारे नाव मेरी है ,तेरे चरणों उतारूँ मैं
----ज्योत्सना सक्सेना

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