दोहे '' पानी '' पर --
पंछी तरसे जल बिना ,प्याऊ भी अब मौन।
बोतल में पानी बिके , किसका बोलो कौन।।
तड़प धरा की तुम सुनो , जानो रे भूगोल।
कुदरत चेताती हमें , होगा पानी गोल।।
बादल धरती से कहे , कैसा है इंसान।
कब्रें अपनी खोद लीं , खुद का है शमशान।।
नीर नयन में रख जरा , पांवों नीचे ओस।
वर्ना पुश्तों के लिए, करना ना अफ़सोस।।
कीमत पानी की नहीं , महँगी होती प्यास।
बूढी आँखें ताकती , फुलवारी की आस।।
---- ज्योत्सना सक्सेना
बोतल में पानी बिके , किसका बोलो कौन।।
तड़प धरा की तुम सुनो , जानो रे भूगोल।
कुदरत चेताती हमें , होगा पानी गोल।।
बादल धरती से कहे , कैसा है इंसान।
कब्रें अपनी खोद लीं , खुद का है शमशान।।
नीर नयन में रख जरा , पांवों नीचे ओस।
वर्ना पुश्तों के लिए, करना ना अफ़सोस।।
कीमत पानी की नहीं , महँगी होती प्यास।
बूढी आँखें ताकती , फुलवारी की आस।।
---- ज्योत्सना सक्सेना
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें