शुक्रवार, जून 10, 2016

गज़ल की शरारत

चाहतें धड़कन बनी थी गुनगुनाती सी लगी 
तीरगी में बन सितारा जगमगाती सी लगी 
आजमा के देख ले फिर इश्क़ करता मुझसे ही 
लाख तू नज़रें छिपाए मुस्कुराती सी लगी 
बेख़ुदी है इश्क़ की जो होश में हैं हम नही 
आग लगने पर फसल दिल लहलहाती सी लगी
गज़ल की देखो शरारत शे'र लब पे लिख दिए
शोख आँखों शायरी खुद खिलखिलाती सी लगी
बेख़बर नादान सा था तोड़ता था दिल मिरा
भूल उनकी ज्योति तुझको फिर सताती सी लगी
-- ज्योत्सना सक्सेना

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