अज्ञान भंवर की लहरों से निकल
दुःख सुख की अविरल धारा संग
कभी डूबते कभी तैरते
सागर की ओर
बहते चलें ---------------------
गुजरा वक़्त गुजर गया
फिर विचार कैसा
नए नज़रिये को अख्तियार कर
नई नई संभावनाओं को
तलाशते चलें -------------------
स्वार्थ छल का
छद्म आवरण उतारकर
बीती ताहि बिसारकर ...
राह नई विवेक की
बुहारते चलें ----------------
आने वाला वक़्त दूर है
अपना दिन संवारकर
आज का आनंद मनाकर
प्रीत के पुष्प राह में
बिखेरते चलें --------------
-- ज्योत्सना सक्सेना
दुःख सुख की अविरल धारा संग
कभी डूबते कभी तैरते
सागर की ओर
बहते चलें ---------------------
गुजरा वक़्त गुजर गया
फिर विचार कैसा
नए नज़रिये को अख्तियार कर
नई नई संभावनाओं को
तलाशते चलें -------------------
स्वार्थ छल का
छद्म आवरण उतारकर
बीती ताहि बिसारकर ...
राह नई विवेक की
बुहारते चलें ----------------
आने वाला वक़्त दूर है
अपना दिन संवारकर
आज का आनंद मनाकर
प्रीत के पुष्प राह में
बिखेरते चलें --------------
-- ज्योत्सना सक्सेना
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