शुक्रवार, जून 10, 2016

महकते नग्मे...

उस शज़र के साये में आज भी खुशबू बिखरी है...
जहाँ छिडके थे कभी हमने, महकते नग्मे...
उस रात के सन्नाटे में स्याही आज भी बहुत है..
जहाँ छत पर बैठकर तोड़े थे तारे तुमने..
वह दरिया खिलखिलाता आज भी बहुत है...
दो बंद मुट्ठियों से डाले थे हरसिंगार उसमे..
चमकती है सुनहरे हर्फों से आज भी वो ज़र्द डायरी ..
दबाये रक्खे थे क्योंकि ख़त सारे तुम्हारे..
जलती है बर्फ सी .. जाने क्यूँ .. हथेली हमारी...
ढूंढती हैं क्यों.. अक्स उसमे आज भी तुम्हारा ज़ालिम...
- ज्योत्सना सक्सेना

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