पपीहे सी पुकारूँ मैं
हवाएं ओस से भीगीं , तराने प्यार के गायें
पहाड़ों गीत गाओ तुम , महकते फूल मुस्काये
नदी छनका रही पायल , बहकती आम की डाली
सखी कैसे कहूं अब मैं , पिया जी ख्वाब में आये
घने कुंतल सँवारे थे , सजी संवरी निहारूं पथ
नहीं लगता सखी मन अब , संदेसा काग से पाये
बहारों में भी खुशबू थी, चमन करते इशारे थे
कमी तो सिर्फ उनकी है , तलैया ताल हर्षाये
सुधा रस प्रेम का बरसा , पपीहे सी पुकारूँ मैं
धरा सी ज्योति प्यासी है , तभी वो मेघ बन छाये
-- ज्योत्सना सक्सेना
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