शुक्रवार, जून 05, 2015

कृषक की संवेदना

तड़कती बिजली 
गरजते बादल 
नयनो में ढलते 
टूटते स्वप्न आस का
टूटा था कांच
बूंदों की किरचें चुभ रहीं
सुलगते खेत देख
रो रहा किसान ---
बहती मिटटी उगल रही
हताशा का संसार
ताश सा थरथराने लगा
उम्मीद भरा महल आलीशान
सुलगते खेत देख
रो रहा किसान ---
दाने दाने सुबक रहे
पूछे अपना मोल
सरसों भटकी राह अपनी
जीरा रोया जार जार
कर्ज ने कतरे पंख
हौसलों के
सुलगते खेत देख
रो रहा किसान ---
कठिन श्रम
ना छुट्टी ना त्यौहार
एक बार फिर जुटना होगा
पुनः कर्मरथ चढ़ना होगा
सूर्य तुम्हे झुकना होगा
तपकर मेरी उम्मीदों पर
एक बार खरा उतरना होगा
आशाओं के दीप जलाता
उठ फिर खड़ा हुआ किसान
-- ज्योत्सना सक्सेना

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