गीतिका :
माटी में हम पाँव जमाएँ
नभ से फिर हम आस लगाएँ
पवन समीरण दीप जलाएँ
लहर लहर मधु घट छलकाएँ
मुखमंडल ओजस्वी दमके
वाणी प्रेम सुधा बरसाएँ
चेतनता के स्वर फिर गूंजे
चलो सृजन की पौध लगाएँ
धुंध समय की गहरी है तो
गीतों का इतिहास बनाएँ
-- ज्योत्सना सक्सेना
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