शुक्रवार, जून 05, 2015

'गीतिका-गुंजन-40' के लिए ''मुक्तक-लोक गीतिका गुंजन सम्मान ''

गीतिका~
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ना दोस्त निकले ना रक़ीब निकले
ये दर्द के रिश्ते बड़े अजीब निकले
समझ आई न हथेली की तहरीरें
मेरे कुछ ऐसे ही नसीब निकले
वफ़ा की राह ना चल सके तुम भी
जो अनजान थे तेरे करीब निकले
किसे दिखाऊं दर्द भरे सन्नाटे
खामोश गम ही मेरे हबीब निकले
दौलत ए वफ़ा से मैं हूँ मालामाल
तुम तो शख्स बड़े ही गरीब निकले
________________ज्योत्सना सक्सेना

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