गुरुवार, मार्च 27, 2014

ganit

नदी में फेंके जाने जाने पत्थर  गिना  करते थे ना तुम
मैं उछले हुए पानी में आनंदविभोर हो जाया करती थी
तुम मेरे और तुम्हारे लिखे खतों का हिसाब रखते थे
और मैं खो जाती थी उसकी संदली सी  महक में
तुम्हारी यादों का  योग किया करती हूँ
भीने एहसासों को द्विगुणित करती हूँ
तुम सदा धन का चिन्ह थे मेरे लिए
इसलिए तुमसे घटकर अपने को
शून्य किया करती हूँ
भाग देकर अपने को
गौण  कर लिया
समर्पण के साथ
गणित में कमजोर
थी ना मैं ....
              -- ज्योत्सना सक्सेना 

3 टिप्‍पणियां:



  1. ☆★☆★☆



    नदी में फेंके जाने वाले पत्थर गिना करते थे न तुम
    मैं उछले हुए पानी में आनंदविभोर हो जाया करती थी
    तुम मेरे और तुम्हारे लिखे ख़तों का हिसाब रखते थे
    और मैं खो जाती थी उसकी संदली-सी महक में
    तुम्हारी यादों का योग किया करती हूं
    भीने एहसासों को द्विगुणित करती हूं
    तुम सदा धन का चिन्ह थे मेरे लिए
    इसलिए तुमसे घटकर अपने को
    शून्य किया करती हूँ
    भाग देकर अपने को
    गौण कर लिया
    समर्पण के साथ

    वाह ! वाऽह…! वाऽऽह…!
    ...और आप गणित में कमजोर थीं
    :)
    बहुत सुंदर कविता है
    आदरणीया ज्योत्सना सक्सेना जी
    हृदय से साधुवाद !

    आपके ब्लॉग पर शायद पहली बार पहुंचा हूं
    अब आते रहना पड़ेगा...
    :)

    मंगलकामनाओं सहित...
    -राजेन्द्र स्वर्णकार


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  2. इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.

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  3. हृदय से आभार ,,,,, आपका राजेंद्र जी

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